मोक्ष संन्यास योग
अंतिम अध्याय। संन्यास, कर्म, ज्ञान, भक्ति, सब एक सूत्र में बँधे। अर्जुन अंत में कहते हैं: जैसा आप कहते हैं, वैसा करूँगा।
सभी 78 श्लोक नीचे।
Wisdom translation, edited by Ankur Shukla. Commentary AI-drafted, human-reviewed. Reviewed June 2026. Methodology →

“अर्जुन बोले हे महाबाहो हे हृषीकेश हे केशिनिषूदन मैं संन्यास और त्यागका तत्त्व अलगअलग जानना चाहता हूँ ॥”पूरा श्लोक 18.1 पढ़ें →सभी श्लोक
- 18.1अ. 18
Clear seeing begins with asking what must be separated.
अर्जुन बोले हे महाबाहो हे हृषीकेश हे केशिनिषूदन मैं संन्यास और त्यागका तत्त्व अलगअलग जानना चाहता हूँ ॥
- 18.2अ. 18
Renunciation means releasing both craving and attachment to results.
॥
- 18.3अ. 18
Renunciation is not simple refusal; some actions must remain.
श्रीभगवान् बोले कई विद्वान् काम्यकर्मोंके त्यागको संन्यास कहते हैं और कई विद्वान् सम्पूर्ण कर्मोंके फलके त्यागको त्याग …
- 18.4अ. 18
Renunciation is not one thing; it has distinct forms.
हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन तू संन्यास और त्याग इन दोनोंमेंसे पहले त्यागके विषयमें मेरा निश्चय सुन क्योंकि हे पुरु…
- 18.5अ. 18
What purifies you should be done, not dropped.
यज्ञ, दान और तपरूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये, प्रत्युत उनको तो करना ही चाहिये क्योंकि यज्ञ, दान और तप ये तीनों ही…
- 18.6अ. 18
Right action is complete only when desire for reward is dropped.
हे पार्थ पूर्वोक्त यज्ञ, दान और तप इन कर्मोंको तथा दूसरे भी कर्मोंको आसक्ति और फलोंका त्याग करके करना चाहिये यह मेरा…
- 18.7अ. 18
Right action should not be abandoned just because it feels difficult.
नियत कर्मका तो त्याग करना उचित नहीं है । उसका मोहपूर्वक त्याग करना तामस कहा गया है ॥
- 18.8अ. 18
Fearful withdrawal is not freedom; it is avoidance wearing a noble name.
जो कुछ कर्म है, वह दुःखरूप ही है ऐसा समझकर कोई शारीरिक क्लेशके भयसे उसका त्याग कर दे, तो वह राजस त्याग करके भी त्यागके …
- 18.9अ. 18
Renunciation means doing what must be done without gripping the result.
हे अर्जुन केवल कर्तव्यमात्र करना है ऐसा समझकर जो नियत कर्म आसक्ति और फलका त्याग करके किया जाता है, वही सात्त्विक त्याग…
- 18.10अ. 18
Freedom means neither resisting the hard nor craving the pleasant.
जो अकुशल कर्मसे द्वेष नहीं करता और कुशल कर्ममें आसक्त नहीं होता, वह त्यागी, बुद्धिमान्, सन्देहरहित और अपने स्वरूपमें स्थ…
- 18.11अ. 18
Freedom begins when action continues and attachment stops.
कारण कि देहधारी मनुष्यके द्वारा सम्पूर्ण कर्मोंका त्याग करना सम्भव नहीं है । इसलिये जो कर्मफलका त्यागी है, वही त्यागी ह…
- 18.12अ. 18
The chain of action ends when desire for its fruit ends.
कर्मफलका त्याग न करनेवाले मनुष्योंको कर्मोंका इष्ट, अनिष्ट और मिश्रित ऐसे तीन प्रकारका फल मरनेके बाद भी होता है परन्तु …
- 18.13अ. 18
Action has many causes; the ego is not the whole story.
हे महाबाहो कर्मोंका अन्त करनेवाले सांख्यसिद्धान्तमें सम्पूर्ण कर्मोंकी सिद्धिके लिये ये पाँच कारण बताये गये हैं, इनको त…
- 18.14अ. 18
Action has many causes, and no one factor owns the result.
इसमें कर्मोंकी सिद्धिमें अधिष्ठान तथा कर्ता और अनेक प्रकारके करण एवं विविध प्रकारकी अलगअलग चेष्टाएँ और वैसे ही पाँचवाँ क…
- 18.15अ. 18
Every deed comes from five causes, not one isolated doer.
मनुष्य, शरीर वाणी और मनके द्वारा शास्त्रविहित अथवा शास्त्रविरुद्ध जो कुछ भी कर्म आरम्भ करता है, उसके ये पूर्वोक्त पाँचों…
- 18.16अ. 18
Action has many causes; the pure self is not the lone doer.
परन्तु ऐसे पाँच हेतुओंके होनेपर भी जो उस कर्मोंके विषयमें केवल शुद्ध आत्माको कर्ता मानता है, वह दुर्मति ठीक नहीं समझता क…
- 18.17अ. 18
Without egoic ownership, action leaves no stain.
जिसका अहंकृतभाव नहीं है और जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती, वह इन सम्पूर्ण प्राणियोंको मारकर भी न मारता है और न बँधता है ॥
- 18.18अ. 18
Action is a system, not a single ego doing everything.
ज्ञान, ज्ञेय और परिज्ञाता इन तीनोंसे कर्मप्रेरणा होती है तथा करण, कर्म और कर्ता इन तीनोंसे कर्मसंग्रह होता है ॥
- 18.19अ. 18
Every action, knower, and deed carries the mark of a quality.
गुणसंख्यान गुणोंके सम्बन्धसे प्रत्येक पदार्थके भिन्नभिन्न भेदोंकी गणना करनेवाले शास्त्रमें गुणोंके भेदसे ज्ञान और कर्म त…
- 18.20अ. 18
True understanding sees one undivided reality inside every divided form.
जिस ज्ञानके द्वारा साधक सम्पूर्ण विभक्त प्राणियोंमें विभागरहित एक अविनाशी भावसत्ता को देखता है, उस ज्ञानको तुम सात्त्विक…
- 18.21अ. 18
Dividing everything into parts is not clarity; it is restless seeing.
परन्तु जो ज्ञान अर्थात् जिस ज्ञानके द्वारा मनुष्य सम्पूर्ण प्राणियोंमें अलगअलग अनेक भावोंको अलगअलग रूपसे जानता है, उस ज्…
- 18.22अ. 18
Small certainty can hide the least real understanding.
किंतु जो ज्ञान एक कार्यरूप शरीरमें ही सम्पूर्णके तरह आसक्त है तथा जो युक्तिरहित, वास्तविक ज्ञानसे रहित और तुच्छ है, वह त…
- 18.23अ. 18
The purest action asks for nothing back.
जो कर्म शास्त्रविधिसे नियत किया हुआ और कर्तृत्वाभिमानसे रहित हो तथा फलेच्छारहित मनुष्यके द्वारा बिना रागद्वेषके किया हुआ…
- 18.24अ. 18
Desire and ego turn action restless, even when it looks productive.
परन्तु जो कर्म भोगोंको चाहनेवाले मनुष्यके द्वारा अहंकार अथवा परिश्रमपूर्वक किया जाता है, वह राजस कहा गया है ॥
- 18.25अ. 18
Blind action begins where clear seeing is absent.
जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और सामर्थ्यको न देखकर मोहपूर्वक आरम्भ किया जाता है, वह तामस कहा जाता है ॥
- 18.26अ. 18
Pure action leaves the ego out and stays calm in victory or defeat.
जो कर्ता रागरहित, अनहंवादी, धैर्य और उत्साहयुक्त तथा सिद्धि और असिद्धिमें निर्विकार है, वह सात्त्विक कहा जाता है ॥
- 18.27अ. 18
Craving turns action into a chase for reward and emotional swing.
जो कर्ता रागी, कर्मफलकी इच्छावाला, लोभी, हिंसाके स्वभाववाला, अशुद्ध और हर्षशोकसे युक्त है, वह राजस कहा गया है ॥
- 18.28अ. 18
Dullness in the doer makes even action inert and harmful.
जो कर्ता असावधान, अशिक्षित, ऐंठअकड़वाला, जिद्दी, उपकारीका अपकार करनेवाला, आलसी, विषादी और दीर्घसूत्री है, वह तामस कहा जा…
- 18.29अ. 18
Understanding and resolve differ by the quality that shapes them.
हे धनञ्जय अब तू गुणोंके अनुसार बुद्धि और धृतिके भी तीन प्रकारके भेद अलगअलगरूपसे सुन, जो कि मेरे द्वारा पूर्णरूपसे कहे ज…
- 18.30अ. 18
True intelligence recognizes the difference between bondage and freedom.
हे पृथानन्दन जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्तिको, कर्तव्य और अकर्तव्यको, भय और अभयको तथा बन्धन और मोक्षको जानती है, वह बु…
- 18.31अ. 18
Restless intelligence cannot tell duty from harm.
हे पार्थ मनुष्य जिसके द्वारा धर्म और अधर्मको, कर्तव्य और अकर्तव्यको भी ठीक तरहसे नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है ॥
- 18.32अ. 18
Darkness can make the wrong choice feel morally correct.
हे पृथानन्दन तमोगुणसे घिरी हुई जो बुद्धि अधर्मको धर्म और सम्पूर्ण चीजोंको उलटा मान लेती है, वह तामसी है ॥
- 18.33अ. 18
Steadiness becomes pure when it keeps the whole being aligned.
हे पार्थ समतासे युक्त जिस अव्यभिचारिणी धृतिके द्वारा मनुष्य मन, प्राण और इन्द्रियोंकी क्रियाओंको धारण करता है, वह धृति …
- 18.34अ. 18
Steadiness becomes restless when it is tied to reward.
हे पृथानन्दन अर्जुन फलकी इच्छावाला मनुष्य जिस धृतिके द्वारा धर्म, काम भोग और अर्थको अत्यन्त आसक्तिपूर्वक धारण करता है, …
- 18.35अ. 18
Clinging to fear and sorrow is not strength; it is tamasic inertia.
हे पार्थ दुष्ट बुद्धिवाला मनुष्य जिस धृतिके द्वारा निद्रा, भय, चिन्ता, दुःख और घमण्डको भी नहीं छोड़ता, वह धृति तामसी है…
- 18.36अ. 18
True happiness begins as discipline and ends as relief.
हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन अब तीन प्रकारके सुखको भी तुम मेरेसे सुनो । जिसमें अभ्याससे रमण होता है और जिससे दुःखों…
- 18.37अ. 18
Lasting ease can begin as discomfort and end as release.
हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन अब तीन प्रकारके सुखको भी तुम मेरेसे सुनो । जिसमें अभ्याससे रमण होता है और जिससे दुःखों…
- 18.38अ. 18
What feels sweetest first can become the harshest later.
जो सुख इन्द्रियों और विषयोंके संयोगसे आरम्भमें अमृतकी तरह और परिणाममें विषकी तरह होता है, वह सुख राजस कहा गया है ॥
- 18.39अ. 18
Pleasure that dulls you is not relief; it is confusion in disguise.
निद्रा, आलस्य और प्रमादसे उत्पन्न होनेवाला जो सुख आरम्भमें और परिणाममें अपनेको मोहित करनेवाला है, वह सुख तामस कहा गया है…
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- 18.40अ. 18
No state is free from the three qualities of nature.
पृथ्वीमें या स्वर्गमें अथवा देवताओंमें तथा इनके सिवाय और कहीं भी वह ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो प्रकृतिसे उत्पन्न इन तीनों…
- 18.41अ. 18
Your rightful work comes from your nature, not imitation.
हे परंतप ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रोंके कर्म स्वभावसे उत्पन्न हुए तीनों गुणोंके द्वारा विभक्त किये गये हैं ॥
- 18.42अ. 18
True duty begins as disciplined character, not public role.
मनका निग्रह करना इन्द्रियोंको वशमें करना धर्मपालनके लिये कष्ट सहना बाहरभीतरसे शुद्ध रहना दूसरोंके अपराधको क्षमा करना शरी…
- 18.43अ. 18
True strength serves, stands firm, and does not retreat.
शूरवीरता, तेज, धैर्य, प्रजाके संचालन आदिकी विशेष चतुरता, युद्धमें कभी पीठ न दिखाना, दान करना और शासन करनेका भाव ये सबके…
- 18.44अ. 18
Every nature has its own rightful work.
खेती करना, गायोंकी रक्षा करना और शुद्ध व्यापार करना ये सबकेसब वैश्यके स्वाभाविक कर्म हैं, तथा चारों वर्णोंकी सेवा करना …
- 18.45अ. 18
Fulfillment comes from living your own work, not someone else’s.
अपनेअपने कर्ममें तत्परतापूर्वक लगा हुआ मनुष्य सम्यक् सिद्धिपरमात्माको प्राप्त कर लेता है । अपने कर्ममें लगा हुआ मनुष्य …
- 18.46अ. 18
Offering your work to the source of life turns ordinary action into fulfillment.
जिस परमात्मासे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, उस परमात्माका अपने कर्मके द्…
- 18.47अ. 18
Your imperfect duty is cleaner than a borrowed perfection.
अच्छी तरहसे अनुष्ठान किये हुए परधर्मसे गुणरहित अपना धर्म श्रेष्ठ है । कारण कि स्वभावसे नियत किये हुए स्वधर्मरूप कर्मको …
- 18.48अ. 18
Your right work is still right, even when it is imperfect.
हे कुन्तीनन्दन दोषयुक्त होनेपर भी सहज कर्मका त्याग नहीं करना चाहिये क्योंकि सम्पूर्ण कर्म धुएँसे अग्निकी तरह किसीनकिसी …
- 18.49अ. 18
Freedom arrives when the mind stops reaching outward.
जिसकी बुद्धि सब जगह आसक्तिरहित है, जिसने शरीरको वशमें कर रखा है, जो स्पृहारहित है, वह मनुष्य सांख्ययोगके द्वारा नैष्कर्म…
- 18.50अ. 18
Knowledge has a highest point: direct arrival, not endless thinking.
हे कौन्तेय सिद्धिअन्तःकरणकी शुद्धि को प्राप्त हुआ साधक ब्रह्मको, जो कि ज्ञानकी परा निष्ठा है, जिस प्रकारसे प्राप्त होता…
- 18.51अ. 18
Purified resolve cuts the pull of craving and aversion.
जो विशुद्ध सात्त्विकी बुद्धिसे युक्त, वैराग्यके आश्रित, एकान्तका सेवन करनेवाला और नियमित भोजन करनेवाला साधक धैर्यपूर्वक …
- 18.52अ. 18
Freedom grows from deliberate simplicity and steady restraint.
जो विशुद्ध सात्त्विकी बुद्धिसे युक्त, वैराग्यके आश्रित, एकान्तका सेवन करनेवाला और नियमित भोजन करनेवाला साधक धैर्यपूर्वक …
- 18.53अ. 18
Peace begins when the sense of ownership ends.
जो विशुद्ध सात्त्विकी बुद्धिसे युक्त, वैराग्यके आश्रित, एकान्तका सेवन करनेवाला और नियमित भोजन करनेवाला साधक धैर्यपूर्वक …
- 18.54अ. 18
Freedom from craving makes room for the highest devotion.
वह ब्रह्मभूतअवस्थाको प्राप्त प्रसन्न मनवाला साधक न तो किसीके लिये शोक करता है और न किसीकी इच्छा करता है । ऐसा सम्पूर्ण …
- 18.55अ. 18
Devoted love turns understanding into immediate nearness.
उस पराभक्तिसे मेरेको, मैं जितना हूँ और जो हूँ इसको तत्त्वसे जान लेता है तथा मेरेको तत्त्वसे जानकर फिर तत्काल मेरेमें प्…
- 18.56अ. 18
Continuous action and complete refuge can lead to the same unchanging state.
मेरा आश्रय लेनेवाला भक्त सदा सब कर्म करता हुआ भी मेरी कृपासे शाश्वत अविनाशी पदको प्राप्त हो जाता है ॥
- 18.57अ. 18
Hand over the action, and let the mind stay gathered there.
चित्तसे सम्पूर्ण कर्म मुझमें अर्पण करके, मेरे परायण होकर तथा समताका आश्रय लेकर निरन्तर मुझमें चित्तवाला हो जा ॥
- 18.58अ. 18
Grace opens the way; ego closes it.
मेरेमें चित्तवाला होकर तू मेरी कृपासे सम्पूर्ण विघ्नोंको तर जायगा और यदि तू अहंकारके कारण मेरी बात नहीं सुनेगा तो तेरा प…
- 18.59अ. 18
Ego cannot veto what your nature has already chosen.
अहंकारका आश्रय लेकर तू जो ऐसा मान रहा है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा, तेरा यह निश्चय मिथ्या झूठा है क्योंकि तेरी क्षात्रप्र…
- 18.60अ. 18
Resistance cannot cancel what your nature is already set to do.
हे कुन्तीनन्दन अपने स्वभावजन्य कर्मसे बँधा हुआ तू मोहके कारण जो नहीं करना चाहता, उसको तू क्षात्रप्रकृतिके परवश होकर करे…
- 18.61अ. 18
The deeper mover is not your ego, and surrender begins there.
हे अर्जुन ईश्वर सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें रहता है और अपनी मायासे शरीररूपी यन्त्रपर आरूढ़ हुए सम्पूर्ण प्राणियोंको उन…
- 18.62अ. 18
Wholehearted surrender opens the door to lasting peace.
हे भरतवंशोद्भव अर्जुन तू सर्वभावसे उस ईश्वरकी ही शरणमें चला जा । उसकी कृपासे तू परमशान्तिसंसारसे सर्वथा उपरति को और अव…
- 18.63अ. 18
True guidance ends by returning choice to you.
यह गुह्यसे भी गुह्यतर शरणागतिरूप ज्ञान मैंने तुझे कह दिया । अब तू इसपर अच्छी तरहसे विचार करके जैसा चाहता है, वैसा कर ॥
- 18.64अ. 18
The deepest teaching is spoken as care, not command.
सबसे अत्यन्त गोपनीय वचन तू फिर मेरेसे सुन । तू मेरा अत्यन्त प्रिय है, इसलिये मैं तेरे हितकी बात कहूँगा ॥
- 18.65अ. 18
Wholehearted devotion becomes the shortest path home.
तू मेरा भक्त हो जा, मेरेमें मनवाला हो जा, मेरा पूजन करनेवाला हो जा और मेरेको नमस्कार कर । ऐसा करनेसे तू मेरेको ही प्राप…
- 18.66अ. 18
Total refuge ends the burden of fear.
सम्पूर्ण धर्मोंका आश्रय छोड़कर तू केवल मेरी शरणमें आ जा । मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा, चिन्ता मत कर ॥
- 18.67अ. 18
Deep truth must be shared only with those ready to receive it.
यह सर्वगुह्यतम वचन अतपस्वीको मत कहना अभक्तको कभी मत कहना जो सुनना नहीं चाहता, उसको मत कहना और जो मेरेमें दोषदृष्टि करता …
- 18.68अ. 18
Devotion deepens when sacred truth is passed on.
मेरेमें पराभक्ति करके जो इस परम गोपनीय संवादगीताग्रन्थ को मेरे भक्तोंमें कहेगा, वह मुझे ही प्राप्त होगा इसमें कोई सन्दे…
- 18.69अ. 18
Sharing this teaching becomes the highest form of devotion.
उसके समान मेरा अत्यन्त प्रिय कार्य करनेवाला मनुष्योंमें कोई भी नहीं है और इस भूमण्डलपर उसके समान मेरा दूसरा कोई प्रियतर …
- 18.70अ. 18
Sincere study of this dialogue becomes worship itself.
जो मनुष्य हम दोनोंके इस धर्ममय संवादका अध्ययन करेगा, उसके द्वारा भी मैं ज्ञानयज्ञसे पूजित होऊँगा ऐसा मेरा मत है ॥
- 18.71अ. 18
Trustful listening can open the door to freedom.
श्रद्धावान् और दोषदृष्टिसे रहित जो मनुष्य इस गीताग्रन्थको सुन भी लेगा, वह भी सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर पुण्यकारियोंके …
- 18.72अ. 18
True listening should end confusion, not just collect words.
हे पृथानन्दन क्या तुमने एकाग्रचित्तसे इसको सुना और हे धनञ्जय क्या तुम्हारा अज्ञानसे उत्पन्न मोह नष्ट हुआ ॥
- 18.73अ. 18
Grace ends confusion and turns insight into obedience.
अर्जुन बोले हे अच्युत आपकी कृपासे मेरा मोह नष्ट हो गया है और स्मृति प्राप्त हो गयी है । मैं सन्देहरहित होकर स्थित हूँ…
- 18.74अ. 18
A true dialogue can leave the listener shaken and changed.
सञ्जय बोले इस प्रकार मैंने भगवान् वासुदेव और महात्मा पृथानन्दन अर्जुनका यह रोमाञ्चित करनेवाला अद्भुत संवाद सुना ॥
- 18.75अ. 18
The deepest teaching is received, not invented.
व्यासजीकी कृपासे मैंने स्वयं इस परम गोपनीय योग गीताग्रन्थ को कहते हुए साक्षात् योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्णसे सुना है ॥
- 18.76अ. 18
A sacred conversation keeps giving joy each time it is remembered.
हे राजन् भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनके इस पवित्र और अद्भुत संवादको याद करकरके मैं बारबार हर्षित हो रहा हूँ ॥
- 18.77अ. 18
Remembering Krishna's vast form still overwhelms the mind with wonder.
हे राजन् भगवान् श्रीकृष्णके उस अत्यन्त अद्भुत विराट्रूपको याद करकरके मेरेको बड़ा भारी आश्चर्य हो रहा है और मैं बारबार ह…
- 18.78अ. 18
Right action carries its own victory.
जहाँ योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीवधनुषधारी अर्जुन हैं, वहाँ ही श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है ऐसा मे…