विषय · 31 श्लोक
भगवद् गीता में Krishna
जहाँ वक्ता का नाम लिया गया है, वे श्लोक यहाँ हैं — जहाँ कृष्ण स्वयं बोलते हैं।
- 2.1संजय बोले वैसी कायरता से आविष्ट उन अर्जुन के प्रति, जो कि विषाद कर रहे हैं और आँसुओं के कारण जिनके नेत्रों की देखने की शक्ति अवरुद्ध हो रही
- 4.5श्रीभगवान् बोले हे परन्तप अर्जुन मेरे और तेरे बहुतसे जन्म हो चुके हैं । उन सबको मैं जानता हूँ, पर तू नहीं जानता ॥
- 4.35जिस तत्त्वज्ञान का अनुभव करनेके बाद तू फिर इस प्रकार मोहको नहीं प्राप्त होगा, और हे अर्जुन जिस तत्त्वज्ञान से तू सम्पूर्ण प्राणियोंको निःशे
- 6.39हे कृष्ण मेरे इस सन्देहका सर्वथा छेदन करनेके लिये आप ही योग्य हैं क्योंकि इस संशयका छेदन करनेवाला आपके सिवाय दूसरा कोई हो नहीं सकता ॥
- 7.14क्योंकि मेरी यह गुणमयी दैवी माया बड़ी दुरत्यय है अर्थात् इससे पार पाना बड़ा कठिन है । जो केवल मेरे ही शरण होते हैं, वे इस मायाको तर जाते है
- 8.5जो मनुष्य अन्तकालमें भी मेरा स्मरण करते हुए शरीर छोड़कर जाता है, वह मेरे स्वरुप को ही प्राप्त होता है, इसमें सन्देह नहीं है ॥
- 8.15महात्मालोग मुझे प्राप्त करके दुःखालय और अशाश्वत पुनर्जन्मको प्राप्त नहीं होते क्योंकि वे परमसिद्धिको प्राप्त हो गये हैं अर्थात् उनको परम प्र
- 8.16हे अर्जुन ब्रह्मलोकतक सभी लोक पुनरावर्ती है परन्तु हे कौन्तेय मुझे प्राप्त होनेपर पुनर्जन्म नहीं होता ॥
- 9.3हे परंतप इस धर्मकी महिमापर श्रद्धा न रखनेवाले मनुष्य मेरे प्राप्त न होकर मृत्युरूप संसारके मार्गमें लौटते रहते हैं अर्थात् बारबार जन्मतेमरते
- 9.25सकामभावसे देवताओंका पूजन करनेवाले शरीर छोड़नेपर देवताओंको प्राप्त होते हैं । पितरोंका पूजन करनेवाले पितरोंको प्राप्त होते हैं । भूतप्रेतों
- 10.3जो मनुष्य मुझे अजन्मा, अनादि और सम्पूर्ण लोकोंका महान् ईश्वर जानता है अर्थात् दृढ़तासे मानता है, वह मनुष्योंमें असम्मूढ़ जानकार है और वह सम्
- 10.7जो मनुष्य मेरी इस विभूतिको और योगको तत्त्वसे जानता है अर्थात् दृढ़तापूर्वक मानता है, वह अविचल भक्तियोगसे युक्त हो जाता है इसमें कुछ भी संशय
- 10.8मैं संसारमात्रका प्रभव मूलकारण हूँ, और मुझसे ही सारा संसार प्रवृत्त हो रहा है अर्थात् चेष्टा कर रहा है ऐसा मेरेको मानकर मेरेमें ही श्रद्धाप
- 10.20हे नींदको जीतनेवाले अर्जुन सम्पूर्ण प्राणियोंके आदि, मध्य तथा अन्तमें भी मैं ही हूँ और प्राणियोंके अन्तःकरणमें आत्मरूपसे भी मैं ही स्थित हू
- 10.41जोजो ऐश्वर्ययुक्त, शोभायुक्त और बलयुक्त प्राणी तथा वस्तु है, उसउसको तुम मेरे ही तेजयोग के अंशसे उत्पन्न हुई समझो ॥
- 10.42अथवा हे अर्जुन तुम्हें इस प्रकार बहुतसी बातें जाननेकी क्या आवश्यकता है मैं अपने किसी एक अंशसे सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त करके स्थित हूँ ॥
- 11.18आप ही जाननेयोग्य परम अक्षर अक्षरब्रह्म हैं, आप ही इस सम्पूर्ण विश्वके परम आश्रय हैं, आप ही सनातनधर्मके रक्षक हैं और आप ही अविनाशी सनातन पुरु
- 11.22जो ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, आठ वसु, बारह साध्यगण, दस विश्वेदेव और दो अश्विनीकुमार, उनचास मरुद्गण, सात पितृगण तथा गन्धर्व, यक्ष, असुर और सि
- 11.24हे विष्णो आपके अनेक देदीप्यमान वर्ण हैं, आप आकाशको स्पर्श कर रहे हैं, आपका मुख फैला हुआ है आपके नेत्र प्रदीप्त और विशाल हैं । ऐसे आपको देख
- 11.30आप अपने प्रज्वलित मुखोंद्वारा सम्पूर्ण लोकोंका ग्रसन करते हुए उन्हें चारों ओरसे बारबार चाट रहे हैं और हे विष्णो आपका उग्र प्रकाश अपने तेजसे
- 11.34द्रोण, भीष्म, जयद्रथ और कर्ण तथा अन्य सभी मेरे द्वारा मारे हुए शूरवीरोंको तुम मारो । तुम व्यथा मत करो और युद्ध करो । युद्धमें तुम निःसन्दे
- 11.42आपकी महिमा और स्वरूपको न जानते हुए मेरे सखा हैं ऐसा मानकर मैंने प्रमादसे अथवा प्रेमसे भी हठपूर्वक बिना सोचेसमझे हे कृष्ण हे यादव हे सखे इ
- 11.44इसलिये शरीरसे लम्बा पड़कर स्तुति करनेयोग्य आप ईश्वरको मैं प्रणाम करके प्रसन्न करना चाहता हूँ । जैसे पिता पुत्रके, मित्र मित्रके और पति पत्न
- 11.46मैं आपको वैसे ही किरीटधारी, गदाधारी और हाथमें चक्र लिये हुए देखना चाहता हूँ । इसलिये हे सहस्रबाहो हे विश्वमूर्ते आप उसी चतुर्भुजरूपसे हो
- 12.2मेरेमें मनको लगाकर नित्यनिरन्तर मेरेमें लगे हुए जो भक्त परम श्रद्धासे युक्त होकर मेरी उपासना करते हैं, वे मेरे मतमें सर्वश्रेष्ठ योगी हैं ॥
- 14.4हे कुन्तीनन्दन सम्पूर्ण योनियोंमें प्राणियोंके जितने शरीर पैदा होते हैं, उन सबकी मूल प्रकृति तो माता है और मैं बीजस्थापन करनेवाला पिता हूँ
- 18.55उस पराभक्तिसे मेरेको, मैं जितना हूँ और जो हूँ इसको तत्त्वसे जान लेता है तथा मेरेको तत्त्वसे जानकर फिर तत्काल मेरेमें प्रविष्ट हो जाता है ॥
- 18.65तू मेरा भक्त हो जा, मेरेमें मनवाला हो जा, मेरा पूजन करनेवाला हो जा और मेरेको नमस्कार कर । ऐसा करनेसे तू मेरेको ही प्राप्त हो जायगा यह मैं
- 18.66सम्पूर्ण धर्मोंका आश्रय छोड़कर तू केवल मेरी शरणमें आ जा । मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा, चिन्ता मत कर ॥
- 18.68मेरेमें पराभक्ति करके जो इस परम गोपनीय संवादगीताग्रन्थ को मेरे भक्तोंमें कहेगा, वह मुझे ही प्राप्त होगा इसमें कोई सन्देह नहीं है ॥
- 18.77हे राजन् भगवान् श्रीकृष्णके उस अत्यन्त अद्भुत विराट्रूपको याद करकरके मेरेको बड़ा भारी आश्चर्य हो रहा है और मैं बारबार हर्षित हो रहा हूँ ॥