ज्ञान कर्म संन्यास योग
ज्ञान यज्ञ। कर्म समर्पण। कृष्ण अपने अवतारों और योग की परंपरा का स्मरण कराते हैं।
सभी 42 श्लोक नीचे।
Wisdom translation, edited by Ankur Shukla. Commentary AI-drafted, human-reviewed. Reviewed June 2026. Methodology →

“श्रीभगवान् बोले मैंने इस अविनाशी योगको सूर्यसे कहा था । फिर सूर्यने अपने पुत्र वैवस्वत मनुसे कहा और मनुने अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकुसे कहा ॥”पूरा श्लोक 4.1 पढ़ें →सभी श्लोक
- 4.1अ. 4
Timeless wisdom survives by being passed on, not newly invented.
श्रीभगवान् बोले मैंने इस अविनाशी योगको सूर्यसे कहा था । फिर सूर्यने अपने पुत्र वैवस्वत मनुसे कहा और मनुने अपने पुत्र र…
- 4.2अ. 4
Even timeless wisdom disappears when no one keeps receiving it.
हे परंतप इस तरह परम्परासे प्राप्त इस कर्मयोग को राजर्षियोंने जाना । परन्तु बहुत समय बीत जानेके कारण वह योग इस मनुष्यलो…
- 4.3अ. 4
The deepest teaching opens only to devotion and trust.
तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है, इसलिये वही यह पुरातन योग आज मैंने तुझसे कहा है क्योंकि यह बड़ा उत्तम रहस्य है ॥
- 4.4अ. 4
Doubt becomes the doorway to deeper seeing.
अर्जुन बोले आपका जन्म तो अभीका है और सूर्यका जन्म बहुत पुराना है अतः आपने ही सृष्टिके आदिमें सूर्यसे यह योग कहा था यह …
- 4.5अ. 4
Your memory is partial; the divine awareness is not.
श्रीभगवान् बोले हे परन्तप अर्जुन मेरे और तेरे बहुतसे जन्म हो चुके हैं । उन सबको मैं जानता हूँ, पर तू नहीं जानता ॥
- 4.6अ. 4
The unborn can still appear without ceasing to be free.
मैं अजन्मा और अविनाशीस्वरूप होते हुए भी तथा सम्पूर्ण प्राणियोंका ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृतिको अधीन करके अपनी योगमाया…
- 4.7अ. 4
When dharma collapses, the divine steps into history.
हे भरतवंशी अर्जुन जबजब धर्मकी हानि और अधर्मकी वृद्धि होती है, तबतब ही मैं अपनेआपको साकाररूपसे प्रकट करता हूँ ॥
- 4.8अ. 4
The divine returns whenever order must be restored.
साधुओंभक्तों की रक्षा करनेके लिये, पापकर्म करनेवालोंका विनाश करनेके लिये और धर्मकी भलीभाँति स्थापना करनेके लिये मैं युगय…
- 4.9अ. 4
Seeing Krishna truly ends the cycle of return.
हे अर्जुन मेरे जन्म और कर्म दिव्य हैं । इस प्रकार मेरे जन्म और कर्मको जो मनुष्य तत्त्वसे जान लेता अर्थात् दृढ़तापूर्वक…
- 4.10अ. 4
Purified minds reach what fear and craving cannot.
राग, भय और क्रोधसे सर्वथा रहित, मेरेमें ही तल्लीन, मेरे ही आश्रित तथा ज्ञानरूप तपसे पवित्र हुए बहुतसे भक्त मेरे भाव स्वर…
- 4.11अ. 4
The divine response matches the way you come forward.
हे पृथानन्दन जो भक्त जिस प्रकार मेरी शरण लेते हैं, मैं उन्हें उसी प्रकार आश्रय देता हूँ क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकारसे …
- 4.12अ. 4
Desire for quick success makes people chase fast-acting powers.
कर्मोंकी सिद्धि फल चाहनेवाले मनुष्य देवताओंकी उपासना किया करते हैं क्योंकि इस मनुष्यलोकमें कर्मोंसे उत्पन्न होनेवाली सिद…
- 4.13अ. 4
The source of order stands outside the order it creates.
मेरे द्वारा गुणों और कर्मोंके विभागपूर्वक चारों वर्णोंकी रचना की गयी है । उससृष्टिरचना आदि का कर्ता होनेपर भी मुझ अव्यय…
- 4.14अ. 4
Knowing the action is not yours to possess breaks its grip.
मेरे द्वारा गुणों और कर्मोंके विभागपूर्वक चारों वर्णोंकी रचना की गयी है । उससृष्टिरचना आदि का कर्ता होनेपर भी मुझ अव्यय…
- 4.15अ. 4
Right action is the path even for those seeking freedom.
पूर्वकालके मुमुक्षुओंने भी इस प्रकार जानकर कर्म किये हैं, इसलिये तू भी पूर्वजोंके द्वारा सदासे किये जानेवाले कर्मोंको ही…
- 4.16अ. 4
Clear seeing about action is what breaks bondage.
कर्म क्या है और अकर्म क्या है इस प्रकार इस विषयमें विद्वान् भी मोहित हो जाते हैं । अतः वह कर्मतत्त्व मैं तुम्हें भलीभा…
- 4.17अ. 4
Action cannot be judged quickly; its true pattern is subtle.
कर्मका तत्त्व भी जानना चाहिये और अकर्मका तत्त्व भी जानना चाहिये तथा विकर्मका तत्त्व भी जानना चाहिये क्योंकि कर्मकी गति ग…
- 4.18अ. 4
Freedom can live inside action, and bondage can hide inside stillness.
जो मनुष्य कर्ममें अकर्म देखता है और जो अकर्ममें कर्म देखता है, वह मनुष्योंमें बुद्धिमान् है, योगी है और सम्पूर्ण कर्मोंक…
- 4.19अ. 4
Knowledge frees action from craving and leaves no binding trace.
जिसके सम्पूर्ण कर्मोंके आरम्भ संकल्प और कामनासे रहित हैं तथा जिसके सम्पूर्ण कर्म ज्ञानरूपी अग्निसे जल गये हैं, उसको ज्ञा…
- 4.20अ. 4
Action loses its grip when nothing in you waits to possess its fruit.
जो कर्म और फलकी आसक्तिका त्याग करके आश्रयसे रहित और सदा तृप्त है, वह कर्मोंमें अच्छी तरह लगा हुआ भी वास्तवमें कुछ भी नही…
- 4.21अ. 4
Freedom from clinging keeps action untouched.
जिसका शरीर और अन्तःकरण अच्छी तरहसे वशमें किया हुआ है, जिसने सब प्रकारके संग्रहका परित्याग कर दिया है, ऐसा आशारहित कर्मयो…
Did you like this chapter?
- 4.22अ. 4
Equal-minded action leaves no hook for bondage.
जो कर्मयोगी फल की इच्छा के बिना, अपनेआप जो कुछ मिल जाय, उसमें सन्तुष्ट रहता है और जो ईर्ष्यासे रहित, द्वन्द्वोंसे अतीत त…
- 4.23अ. 4
Action loses its grip when it becomes offering, not possession.
जिसकी आसक्ति सर्वथा मिट गयी है, जो मुक्त हो गया है, जिसकी बुद्धि स्वरूपके ज्ञानमें स्थित है, ऐसे केवल यज्ञके लिये कर्म क…
- 4.24अ. 4
When action is fully absorbed, even the result is not separate from Brahman.
जिस यज्ञमें अर्पण भी ब्रह्म है, हवी भी ब्रह्म है और ब्रह्मरूप कर्ताके द्वारा ब्रह्मरूप अग्निमें आहुति देनारूप क्रिया भी …
- 4.25अ. 4
Sacrifice changes shape, but its aim remains surrender into the absolute.
अन्य योगीलोग भगवदर्पणरूप यज्ञका ही अनुष्ठान करते हैं और दूसरे योगीलोग ब्रह्मरूप अग्निमें विचाररूप यज्ञके द्वारा ही जीवात…
- 4.26अ. 4
Restraint can consume desire before desire consumes you.
अन्य योगीलोग श्रोत्रादि समस्त इन्द्रियोंका संयमरूप अग्नियोंमें हवन किया करते हैं और दूसरे योगीलोग शब्दादि विषयोंका इन्द्…
- 4.27अ. 4
Knowledge turns self-control into a fire that consumes every impulse.
अन्य योगीलोग सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी क्रियाओंको और प्राणोंकी क्रियाओंको ज्ञानसे प्रकाशित आत्मसंयमयोगरूप अग्निमें हवन किया …
- 4.28अ. 4
Sacrifice can be wealth, effort, austerity, or study.
दूसरे कितने ही तीक्ष्ण व्रत करनेवाले प्रयत्नशील साधक द्रव्यसम्बन्धी यज्ञ करनेवाले हैं, और कितने ही तपोयज्ञ करनेवाले हैं,…
- 4.29अ. 4
Breath itself can become disciplined offering.
दूसरे कितने ही प्राणायामके परायण हुए योगीलोग अपानमें प्राणका पूरक करके, प्राण और अपानकी गति रोककर फिर प्राणमें अपानका हव…
- 4.30अ. 4
Discipline itself becomes offering, and offering burns away inner stain.
दूसरे कितने ही प्राणायामके परायण हुए योगीलोग अपानमें प्राणका पूरक करके, प्राण और अपानकी गति रोककर फिर प्राणमें अपानका हव…
- 4.31अ. 4
A life without offering cannot even support itself.
हे कुरुवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन यज्ञसे बचे हुए अमृतका अनुभव करनेवाले सनातन परब्रह्म परमात्माको प्राप्त होते हैं । यज्…
- 4.32अ. 4
Seeing every offering as action frees you from action’s binding force.
इस प्रकार और भी बहुत तरहके यज्ञ वेदकी वाणीमें विस्तारसे कहे गये हैं । उन सब यज्ञोंको तू कर्मजन्य जान । इस प्रकार जानकर…
- 4.33अ. 4
Knowledge is the point where every action finally comes to rest.
हे परन्तप अर्जुन द्रव्यमय यज्ञसे ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है । सम्पूर्ण कर्म और पदार्थ ज्ञानतत्त्वज्ञान में समाप्त हो जाते है…
- 4.34अ. 4
Humility opens the door to knowledge that pride cannot reach.
उस तत्त्वज्ञान को तत्त्वदर्शी ज्ञानी महापुरुषोंके पास जाकर समझ । उनको साष्टाङ्ग दण्डवत् प्रणाम करनेसे, उनकी सेवा करनेसे…
- 4.35अ. 4
Knowing deeply ends confusion by revealing one reality in all beings.
जिस तत्त्वज्ञान का अनुभव करनेके बाद तू फिर इस प्रकार मोहको नहीं प्राप्त होगा, और हे अर्जुन जिस तत्त्वज्ञान से तू सम्पूर…
- 4.36अ. 4
Clear understanding can carry even the heaviest past across.
अगर तू सब पापियोंसे भी अधिक पापी है, तो भी तू ज्ञानरूपी नौकाके द्वारा निःसन्देह सम्पूर्ण पापसमुद्रसे अच्छी तरह तर जायगा …
- 4.37अ. 4
Real understanding burns the binding power of every action.
हे अर्जुन जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधनोंको सर्वथा भस्म कर देती है, ऐसे ही ज्ञानरूपी अग्नि सम्पूर्ण कर्मोंको सर्वथा भस्म कर…
- 4.38अ. 4
Nothing purifies like knowledge, and yoga ripens it from within.
इस मनुष्यलोकमें ज्ञानके समान पवित्र करनेवाला निःसन्देह दूसरा कोई साधन नहीं है । जिसका योग भलीभाँति सिद्ध हो गया है, वह …
- 4.39अ. 4
Trust, discipline, and restraint make room for peace.
जो जितेन्द्रिय तथा साधनपरायण है, ऐसा श्रद्धावान् मनुष्य ज्ञानको प्राप्त होता है और ज्ञानको प्राप्त होकर वह तत्काल परम शा…
- 4.40अ. 4
A divided mind loses both peace and direction.
विवेकहीन और श्रद्धारहित संशयात्मा मनुष्यका पतन हो जाता है । ऐसे संशयात्मा मनुष्यके लिये न यह लोक है न परलोक है और न सुख…
- 4.41अ. 4
Freedom begins when action no longer leaves a hook.
हे धनञ्जय योग समता के द्वारा जिसका सम्पूर्ण कर्मोंसे सम्बन्धविच्छेद हो गया है और ज्ञानके द्वारा जिसके सम्पूर्ण संशयोंका…
- 4.42अ. 4
Knowledge cuts doubt, and then action becomes possible again.
इसलिये हे भरतवंशी अर्जुन हृदयमें स्थित इस अज्ञानसे उत्पन्न अपने संशयका ज्ञानरूप तलवारसे छेदन करके योग समता में स्थित हो…