भगवद् गीता में Gunas
भगवद् गीता के 47 श्लोक जो gunas पर हैं — सभी अध्यायों से, क्रम में।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते ॥
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ॥
- 3.29अ. 3
Clarity should guide confusion, not crush it.
प्रकृतिजन्य गुणोंसे अत्यन्त मोहित हुए अज्ञानी मनुष्य गुणों और कर्मोंमें आसक्त रहते हैं । उन पूर्णतया न समझनेवाले मन्दबु
- 3.33अ. 3
Nature drives behavior; force alone cannot overrule it.
सम्पूर्ण प्राणी प्रकृतिको प्राप्त होते हैं । ज्ञानी महापुरुष भी अपनी प्रकृतिके अनुसार चेष्टा करता है । फिर इसमें किसीक
- 7.12अ. 7
All qualities arise in the divine, yet the divine is not bound by any of them.
और तो क्या कहूँ जितने भी सात्त्विक, राजस और तामस भाव हैं, वे सब मुझ से ही होते हैं ऐसा समझो । पर मैं उनमें और वे मेरेम
- 13.15अ. 13
What sustains everything is beyond the senses that perceive it.
वे परमात्मा सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे रहित हैं और सम्पूर्ण इन्द्रियोंके विषयोंको प्रकाशित करनेवाले हैं आसक्तिरहित हैं और सम्
- 13.20अ. 13
Change belongs to nature; awareness is not caught in it.
प्रकृति और पुरुष दोनोंको ही तुम अनादि समझो और विकारों तथा गुणोंको भी प्रकृतिसे ही उत्पन्न समझो । कार्य और करणके द्वारा
- 13.22अ. 13
Attachment to changing qualities keeps the cycle of birth going.
प्रकृतिमें स्थित पुरुष ही प्रकृतिजन्य गुणोंका भोक्ता बनता है और गुणोंका सङ्ग ही उसके ऊँचनीच योनियोंमें जन्म लेनेका कारण
- 13.24अ. 13
Clear seeing frees you while life still continues.
इस प्रकार पुरुषको और गुणोंके सहित प्रकृतिको जो मनुष्य अलगअलग जानता है, वह सब तरहका बर्ताव करता हुआ भी फिर जन्म नहीं लेता
- 14.5अ. 14
Nature's three forces keep the changeless one identified with the body.
हे महाबाहो प्रकृतिसे उत्पन्न होनेवाले सत्त्व, रज और तम ये तीनों गुण अविनाशी देहीको देहमें बाँध देते हैं ॥
- 14.6अ. 14
Even clarity becomes bondage when you cling to its pleasure.
हे पापरहित अर्जुन उन गुणोंमें सत्त्वगुण निर्मल स्वच्छ होनेके कारण प्रकाशक और निर्विकार है । वह सुख और ज्ञानकी आसक्तिसे
- 14.7अ. 14
Craving turns action into a chain.
हे कुन्तीनन्दन तृष्णा और आसक्तिको पैदा करनेवाले रजोगुणको तुम रागस्वरूप समझो । वह कर्मोंकी आसक्तिसे शरीरधारीको बाँधता ह
- 14.9अ. 14
Each force traps you in a different way: comfort, activity, or blindness.
हे भरतवंशोद्भव अर्जुन सत्त्वगुण सुखमें और रजोगुण कर्ममें लगाकर मनुष्यपर विजय करता है तथा तमोगुण ज्ञानको ढककर एवं प्रमाद
- 14.10अ. 14
What dominates the mind is temporary, not who you are.
हे भरतवंशोद्भव अर्जुन रजोगुण और तमोगुणको दबाकर सत्त्वगुण सत्त्वगुण, और तमोगुणको दबाकर रजोगुण, वैसे ही सत्त्वगुण और रजोग
- 14.11अ. 14
Inner brightness is the sign that clarity is taking over.
जब इस मनुष्यशरीरमें सब द्वारोंइन्द्रियों और अन्तःकरण में प्रकाश स्वच्छता और ज्ञान विवेक प्रकट हो जाता है, तब जानना चाहिय
- 14.12अ. 14
Restless wanting multiplies action, but never settles the mind.
हे भरतवंशमें श्रेष्ठ अर्जुन रजोगुणके बढ़नेपर लोभ, प्रवृत्ति, कर्मोंका आरम्भ, अशान्ति और स्पृहा ये वृत्तियाँ पैदा होती
- 14.13अ. 14
Darkness does not stay still; it breeds neglect and confusion.
हे कुरुनन्दन तमोगुणके बढ़नेपर अप्रकाश, अप्रवृत्ति, प्रमाद और मोह ये वृत्तियाँ भी पैदा होती हैं ॥
- 14.14अ. 14
A clear state carries consciousness toward a clearer destination.
जिस समय सत्त्वगुण बढ़ा हो, उस समय यदि देहधारी मनुष्य मर जाता है, तो वह,उत्तमवेत्ताओंके निर्मल लोकोंमें जाता है ॥
- 14.15अ. 14
Your strongest tendency decides the shape of your next beginning.
रजोगुणके बढ़नेपर मरनेवाला प्राणी मनुष्ययोनिमें जन्म लेता है तथा तमोगुणके बढ़नेपर मरनेवाला मूढ़योनियोंमें जन्म लेता है ॥
- 14.16अ. 14
Action carries its own flavor of result.
विवेकी पुरुषोंने शुभकर्मका तो सात्त्विक निर्मल फल कहा है, राजस कर्मका फल दुःख कहा है और तामस कर्मका फल अज्ञान मूढ़ता कहा
- 14.17अ. 14
Your mental weather has causes: clarity, craving, and confusion each grow from different qualities.
सत्त्वगुणसे ज्ञान और रजोगुणसे लोभ आदि ही उत्पन्न होते हैं तमोगुणसे प्रमाद, मोह एवं अज्ञान भी उत्पन्न होता है ॥
- 14.18अ. 14
Your inner quality decides the direction of your life.
सत्त्वगुणमें स्थित मनुष्य ऊर्ध्वलोकोंमें जाते हैं, रजोगुणमें स्थित मनुष्य मृत्युलोकमें जन्म लेते हैं और निन्दनीय तमोगुणक
- 14.19अ. 14
Freedom begins when you stop mistaking qualities for a personal doer.
जब विवेकी विचारकुशल मनुष्य तीनों गुणोंके सिवाय अन्य किसीको कर्ता नहीं देखता और अपनेको गुणोंसे पर अनुभव करता है, तब वह मे
- 14.20अ. 14
Freedom begins when the three qualities no longer define you.
देहधारी विवेकी मनुष्य देहको उत्पन्न करनेवाले इन तीनों गुणोंका अतिक्रमण करके जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्थारूप दुःखोंसे रहित
- 14.21अ. 14
Real freedom must be visible, livable, and learnable.
अर्जुन बोले हे प्रभो इन तीनों गुणोंसे अतीत हुआ मनुष्य किन लक्षणोंसे युक्त होता है उसके आचरण कैसे होते हैं और इन तीनों
- 14.22अ. 14
Freedom begins when changing states stop controlling your response.
श्रीभगवान् बोले हे पाण्डव प्रकाश, प्रवृत्ति तथा मोह ये सभी अच्छी तरहसे प्रवृत्त हो जायँ तो भी गुणातीत मनुष्य इनसे द्व
- 14.23अ. 14
Freedom begins when movement happens, but identity does not.
जो उदासीनकी तरह स्थित है और जो गुणोंके द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता तथा गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं इस भावसे जो अपने
- 14.24अ. 14
Steadiness means nothing external gets to decide your center.
जो धीर मनुष्य सुखदुःखमें सम तथा अपने स्वरूपमें स्थित रहता है जो मिट्टीके ढेले, पत्थर और सोनेमें सम रहता है जो प्रियअप्रि
- 14.25अ. 14
Freedom begins when praise, blame, and personal impulse lose their power over you.
जो धीर मनुष्य सुखदुःखमें सम तथा अपने स्वरूपमें स्थित रहता है जो मिट्टीके ढेले, पत्थर और सोनेमें सम रहता है जो प्रियअप्रि
- 14.26अ. 14
Steady devotion can carry you beyond the forces that shape ordinary life.
जो मनुष्य अव्यभिचारी भक्तियोगके द्वारा मेरा सेवन करता है, वह इन गुणोंका अतिक्रमण करके ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है
- 15.2अ. 15
Craving and action keep the world-tree growing in every direction.
उस संसारवृक्षकी गुणोंसत्त्व, रज और तम के द्वारा बढ़ी हुई तथा विषयरूप कोंपलोंवाली शाखाएँ नीचे, मध्यमें और ऊपर सब जगह फैली
- 15.10अ. 15
What changes is seen by the wise; the true self is not what moves.
शरीरको छोड़कर जाते हुए या दूसरे शरीरमें स्थित हुए अथवा विषयोंको भोगते हुए भी गुणोंसे युक्त जीवात्माके स्वरूपको मूढ़ मनुष
- 17.2अ. 17
Faith takes the shape of the nature beneath it.
श्रीभगवान् बोले मनुष्योंकी वह स्वभावसे उत्पन्न हुई श्रद्धा सात्त्विकी तथा राजसी और तामसी ऐसे तीन तरहकी ही होती है, उसक
- 17.8अ. 17
Wholesome food quietly builds the conditions for a steadier life.
आयु, सत्त्वगुण, बल, आरोग्य, सुख और प्रसन्नता बढ़ानेवाले, स्थिर रहनेवाले, हृदयको शक्ति देनेवाले, रसयुक्त तथा चिकने ऐसे आ
- 17.10अ. 17
What you repeatedly choose to consume reveals the heaviness within.
जो भोजन अधपका, रसरहित, दुर्गन्धित, बासी और उच्छिष्ट है तथा जो महान् अपवित्र भी है, वह तामस मनुष्यको प्रिय होता है ॥
- 18.19अ. 18
Every action, knower, and deed carries the mark of a quality.
गुणसंख्यान गुणोंके सम्बन्धसे प्रत्येक पदार्थके भिन्नभिन्न भेदोंकी गणना करनेवाले शास्त्रमें गुणोंके भेदसे ज्ञान और कर्म त
- 18.21अ. 18
Dividing everything into parts is not clarity; it is restless seeing.
परन्तु जो ज्ञान अर्थात् जिस ज्ञानके द्वारा मनुष्य सम्पूर्ण प्राणियोंमें अलगअलग अनेक भावोंको अलगअलग रूपसे जानता है, उस ज्
- 18.22अ. 18
Small certainty can hide the least real understanding.
किंतु जो ज्ञान एक कार्यरूप शरीरमें ही सम्पूर्णके तरह आसक्त है तथा जो युक्तिरहित, वास्तविक ज्ञानसे रहित और तुच्छ है, वह त
- 18.27अ. 18
Craving turns action into a chase for reward and emotional swing.
जो कर्ता रागी, कर्मफलकी इच्छावाला, लोभी, हिंसाके स्वभाववाला, अशुद्ध और हर्षशोकसे युक्त है, वह राजस कहा गया है ॥
- 18.28अ. 18
Dullness in the doer makes even action inert and harmful.
जो कर्ता असावधान, अशिक्षित, ऐंठअकड़वाला, जिद्दी, उपकारीका अपकार करनेवाला, आलसी, विषादी और दीर्घसूत्री है, वह तामस कहा जा
- 18.29अ. 18
Understanding and resolve differ by the quality that shapes them.
हे धनञ्जय अब तू गुणोंके अनुसार बुद्धि और धृतिके भी तीन प्रकारके भेद अलगअलगरूपसे सुन, जो कि मेरे द्वारा पूर्णरूपसे कहे ज
- 18.32अ. 18
Darkness can make the wrong choice feel morally correct.
हे पृथानन्दन तमोगुणसे घिरी हुई जो बुद्धि अधर्मको धर्म और सम्पूर्ण चीजोंको उलटा मान लेती है, वह तामसी है ॥
- 18.35अ. 18
Clinging to fear and sorrow is not strength; it is tamasic inertia.
हे पार्थ दुष्ट बुद्धिवाला मनुष्य जिस धृतिके द्वारा निद्रा, भय, चिन्ता, दुःख और घमण्डको भी नहीं छोड़ता, वह धृति तामसी है
- 18.36अ. 18
True happiness begins as discipline and ends as relief.
हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन अब तीन प्रकारके सुखको भी तुम मेरेसे सुनो । जिसमें अभ्याससे रमण होता है और जिससे दुःखों
- 18.38अ. 18
What feels sweetest first can become the harshest later.
जो सुख इन्द्रियों और विषयोंके संयोगसे आरम्भमें अमृतकी तरह और परिणाममें विषकी तरह होता है, वह सुख राजस कहा गया है ॥
- 18.39अ. 18
Pleasure that dulls you is not relief; it is confusion in disguise.
निद्रा, आलस्य और प्रमादसे उत्पन्न होनेवाला जो सुख आरम्भमें और परिणाममें अपनेको मोहित करनेवाला है, वह सुख तामस कहा गया है