विषय · 34 श्लोक

भगवद् गीता में Moksha

मोक्ष गीता का शब्द है मुक्ति के लिए — संसार से पलायन नहीं, उसमें स्वतंत्रता। जब भ्रांति मिटती है, जो शेष रहता है वही मोक्ष है। ये वे श्लोक हैं जहाँ कृष्ण उस लक्ष्य का नाम लेते हैं जिसके लिए सारी शिक्षा है।

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भगवद् गीता 2.72Speaker: Krishna
एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति
स्थित्वाऽस्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति
अर्थ · हिन्दी
हे पृथानन्दन यह ब्राह्मी स्थिति है । इसको प्राप्त होकर कभी कोई मोहित नहीं होता । इस स्थितिमें यदि अन्तकालमें भी स्थित हो जाय, तो निर्वाण शान्त ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है ॥
सार
A person who reaches this steady inner state is no longer confused. Even at life’s end, that steadiness leads to freedom in the supreme reality.
Steadiness in the supreme reality ends confusion, even at life’s edge.
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भगवद् गीता 4.9Speaker: Krishna
जन्म कर्म मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन
अर्थ · हिन्दी
हे अर्जुन मेरे जन्म और कर्म दिव्य हैं । इस प्रकार मेरे जन्म और कर्मको जो मनुष्य तत्त्वसे जान लेता अर्थात् दृढ़तापूर्वक मान लेता है, वह शरीरका त्याग करके पुनर्जन्मको प्राप्त नहीं होता, प्रत्युत मुझे प्राप्त होता है ॥
सार
Krishna says his birth and actions are not ordinary. Whoever understands their divine nature reaches him and is not born again.
Seeing Krishna truly ends the cycle of return.
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भगवद् गीता 4.16Speaker: Krishna
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्
अर्थ · हिन्दी
कर्म क्या है और अकर्म क्या है इस प्रकार इस विषयमें विद्वान् भी मोहित हो जाते हैं । अतः वह कर्मतत्त्व मैं तुम्हें भलीभाँति कहूँगा, जिसको जानकर तू अशुभ संसारबन्धन से मुक्त हो जायगा ॥
सार
Even intelligent people get confused about what action and inaction really mean. Krishna says he will explain it clearly so Arjuna can be freed from harmful bondage.
Clear seeing about action is what breaks bondage.
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