अध्याय 9 · राजविद्या और राजगुह्य का योग
राजविद्या राजगुह्य योग
राजविद्या — सर्वोच्च रहस्य। हर वस्तु में कृष्ण की उपस्थिति। और प्रेम से किया गया छोटा सा अर्पण।
सभी 34 श्लोक नीचे।

श्लोक
- 9.1श्रीभगवान् बोले यह अत्यन्त गोपनीय विज्ञानसहित ज्ञान दोषदृष्टिरहित तेरे लिये तो मैं फिर अच्छी तरहसे कहूँगा, जिसको जानकर तू अशुभसे अर्थात् जन…
- 9.2यह सम्पूर्ण विद्याओंका और सम्पूर्ण गोपनीयोंका राजा है । यह अति पवित्र तथा अतिश्रेष्ठ है और इसका फल भी प्रत्यक्ष है । यह धर्ममय है, अविनाशी…
- 9.3हे परंतप इस धर्मकी महिमापर श्रद्धा न रखनेवाले मनुष्य मेरे प्राप्त न होकर मृत्युरूप संसारके मार्गमें लौटते रहते हैं अर्थात् बारबार जन्मतेमरते…
- 9.4यह सब संसार मेरे निराकार स्वरूपसे व्याप्त है । सम्पूर्ण प्राणी मेरेमें स्थित हैं परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ तथा वे प्राणी भी मुझ में स…
- 9.5यह सब संसार मेरे निराकार स्वरूपसे व्याप्त है । सम्पूर्ण प्राणी मुझ में स्थित हैं परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ तथा वे प्राणी भी मेरेमें स…
- 9.6जैसे सब जगह विचरनेवाली महान् वायु नित्य ही आकाशमें स्थित रहती है, ऐसे ही सम्पूर्ण प्राणी मुझमें ही स्थित रहते हैं ऐसा तुम मान लो ॥
- 9.7हे कुन्तीनन्दन कल्पोंका क्षय होनेपर सम्पूर्ण प्राणी मेरी प्रकृतिको प्राप्त होते हैं और कल्पोंके आदिमें मैं फिर उनकी रचना करता हूँ ॥
- 9.8प्रकृतिके वशमें होनेसे परतन्त्र हुए इस सम्पूर्ण प्राणिसमुदायको मैं कल्पोंके आदिमें अपनी प्रकृतिको वशमें करके बारबार रचता हूँ ॥
- 9.9हे धनञ्जय उन सृष्टिरचना आदि कर्मोंमें अनासक्त और उदासीनकी तरह रहते हुए मेरेको वे कर्म नहीं बाँधते ॥
- 9.10प्रकृति मेरी अध्यक्षतामें सम्पूर्ण चराचर जगत् को रचती है । हे कुन्तीनन्दन इसी हेतुसे जगत् का विविध प्रकारसे परिवर्तन होता है ॥
- 9.11मूर्खलोग मेरे सम्पूर्ण प्राणियोंके महान् ईश्वररूप परमभावको न जानते हुए मुझे मनुष्यशरीरके आश्रित मानकर अर्थात् साधारण मनुष्य मानकर मेरी अवज्ञ…
- 9.12जिनकी सब आशाएँ व्यर्थ होती हैं, सब शुभकर्म व्यर्थ होते हैं और सब ज्ञान व्यर्थ होते हैं अर्थात् जिनकी आशाएँ, कर्म और ज्ञान सत्फल देनेवाले नही…
- 9.13परन्तु हे पृथानन्दन दैवी प्रकृतिके आश्रित अनन्यमनवाले महात्मालोग मुझे सम्पूर्ण प्राणियोंका आदि और अविनाशी समझकर मेरा भजन करते हैं ॥
- 9.14नित्य मेरेमें युक्त मनुष्य दृढ़व्रती होकर लगनपूर्वक साधनमें लगे हुए और भक्तिपूर्वक कीर्तन करते हुए तथा नमस्कार करते हुये निरन्तर मेरी उपासना…
- 9.15दूसरे साधक ज्ञानयज्ञके द्वारा एकीभावसे अभेदभावसे मेरा पूजन करते हुए मेरी उपासना करते हैं और दूसरे कई साधक अपनेको पृथक् मानकर चारों तरफ मुखवा…
- 9.16क्रतु मैं हूँ, यज्ञ मैं हूँ, स्वधा मैं हूँ, औषध मैं हूँ, मन्त्र मैं हूँ, घृत मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ और हवनरूप क्रिया भी मैं हूँ । जाननेयोग्…
- 9.17क्रतु मैं हूँ, यज्ञ मैं हूँ, स्वधा मैं हूँ, औषध मैं हूँ, मन्त्र मैं हूँ, घृत मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ और हवनरूप क्रिया भी मैं हूँ । जाननेयोग्…
- 9.18क्रतु मैं हूँ, यज्ञ मैं हूँ, स्वधा मैं हूँ, औषध मैं हूँ, मन्त्र मैं हूँ, घृत मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ और हवनरूप क्रिया भी मैं हूँ । जाननेयोग्…
- 9.19हे अर्जुन संसारके हितके लिये मैं ही सूर्यरूपसे तपता हूँ, जलको ग्रहण करता हूँ और फिर उस जलको वर्षारूपसे बरसा देता हूँ । और तो क्या कहूँ अमृ…
- 9.20वेदत्रयीमें कहे हुए सकाम अनुष्ठानको करनेवाले और सोमरसको पीनेवाले जो पापरहित मनुष्य यज्ञोंके द्वारा इन्द्ररूपसे मेरा पूजन करके स्वर्गप्राप्ति…
- 9.21वे उस विशाल स्वर्गलोकके भोगोंको भोगकर पुण्य क्षीण होनेपर मृत्युलोकमें आ जाते हैं । इस प्रकार तीनों वेदोंमें कहे हुए सकाम धर्मका आश्रय लिये …
- 9.22जो अनन्य भक्त मेरा चिन्तन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, मेरेमें निरन्तर लगे हुए उन भक्तोंका योगक्षेम अप्राप्तकी प्राप्ति और प्राप्तकी रक्षा…
- 9.23हे कुन्तीनन्दन जो भी भक्त मनुष्य श्रद्धापूर्वक अन्य देवताओंका पूजन करते हैं, वे भी करते हैं मेरा ही पूजन, पर करते है अविधिपूर्वक ॥
- 9.24क्योंकि मैं ही सम्पूर्ण यज्ञोंका भोक्ता और स्वामी भी हूँ परन्तु वे मेरेको तत्त्वसे नहीं जानते, इसीसे उनका पतन होता है ॥
- 9.25सकामभावसे देवताओंका पूजन करनेवाले शरीर छोड़नेपर देवताओंको प्राप्त होते हैं । पितरोंका पूजन करनेवाले पितरोंको प्राप्त होते हैं । भूतप्रेतों…
- 9.26जो भक्त पत्र, पुष्प, फल, जल आदि यथासाध्य प्राप्त वस्तु को भक्तिपूर्वक मेरे अर्पण करता है, उस मेरेमें तल्लीन हुए अन्तःकरणवाले भक्तके द्वारा भ…
- 9.27हे कुन्तीपुत्र तू जो कुछ करता है, जो कुछ खाता है, जो कुछ यज्ञ करता है, जो कुछ दान देता है और जो कुछ तप करता है, वह सब मेरे अर्पण कर दे ॥
- 9.28इस प्रकार मेरे अर्पण करनेसे जिनसे कर्मबन्धन होता है, ऐसे शुभ विहित और अशुभ निषिद्ध सम्पूर्ण कर्मोंके फलोंसे तू मुक्त हो जायगा । ऐसे अपनेसहि…
- 9.29मैं सम्पूर्ण प्राणियोंमें समान हूँ । उन प्राणियोंमें न तो कोई मेरा द्वेषी है और न कोई प्रिय है । परन्तु जो भक्तिपूर्वक मेरा भजन करते हैं, …
- 9.30अगर कोई दुराचारीसेदुराचारी भी अनन्यभावसे मेरा भजन करता है, तो उसको साधु ही मानना चाहिये । कारण कि उसने निश्चय बहुत अच्छी तरह कर लिया है ॥
- 9.31वह तत्काल उसी क्षण धर्मात्मा हो जाता है और निरन्तर रहनेवाली शान्तिको प्राप्त हो जाता है । हे कुन्तीनन्दन तुम प्रतिज्ञा करो कि मेरे भक्तका …
- 9.32हे पृथानन्दन जो भी पापयोनिवाले हों तथा जो भी स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र हों, वे भी सर्वथा मेरे शरण होकर निःसन्देह परमगतिको प्राप्त हो जाते ह…
- 9.33जो पवित्र आचरणवाले ब्राह्मण और ऋषिस्वरूप क्षत्रिय भगवान् के भक्त हों, वे परमगतिको प्राप्त हो जायँ, इसमें तो कहना ही क्या है । इसलिये इस अनि…
- 9.34तू मेरा भक्त हो जा, मेरेमें मनवाला हो जा, मेरा पूजन करनेवाला हो जा और मेरेको नमस्कार कर । इस प्रकार मेरे साथ अपनेआपको लगाकर, मेरे परायण हुआ…