राजविद्या राजगुह्य योग
राजविद्या, सर्वोच्च रहस्य। हर वस्तु में कृष्ण की उपस्थिति। और प्रेम से किया गया छोटा सा अर्पण।
सभी 34 श्लोक नीचे।
Wisdom translation, edited by Ankur Shukla. Commentary AI-drafted, human-reviewed. Reviewed June 2026. Methodology →

“श्रीभगवान् बोले यह अत्यन्त गोपनीय विज्ञानसहित ज्ञान दोषदृष्टिरहित तेरे लिये तो मैं फिर अच्छी तरहसे कहूँगा, जिसको जानकर तू अशुभसे अर्थात् जन्ममरणरूप संसारसे मुक्त हो जायगा ॥”पूरा श्लोक 9.1 पढ़ें →सभी श्लोक
- 9.1अ. 9
The deepest truth frees only a heart that does not resist it.
श्रीभगवान् बोले यह अत्यन्त गोपनीय विज्ञानसहित ज्ञान दोषदृष्टिरहित तेरे लिये तो मैं फिर अच्छी तरहसे कहूँगा, जिसको जानकर …
- 9.2अ. 9
The highest truth is both profound and simple to live.
यह सम्पूर्ण विद्याओंका और सम्पूर्ण गोपनीयोंका राजा है । यह अति पवित्र तथा अतिश्रेष्ठ है और इसका फल भी प्रत्यक्ष है । य…
- 9.3अ. 9
Without trust, the highest teaching cannot carry you beyond repetition.
हे परंतप इस धर्मकी महिमापर श्रद्धा न रखनेवाले मनुष्य मेरे प्राप्त न होकर मृत्युरूप संसारके मार्गमें लौटते रहते हैं अर्था…
- 9.4अ. 9
The supreme reality holds everything without being held by anything.
यह सब संसार मेरे निराकार स्वरूपसे व्याप्त है । सम्पूर्ण प्राणी मेरेमें स्थित हैं परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ तथा वे…
- 9.5अ. 9
The supreme reality sustains all beings without being contained by them.
यह सब संसार मेरे निराकार स्वरूपसे व्याप्त है । सम्पूर्ण प्राणी मुझ में स्थित हैं परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ तथा वे…
- 9.6अ. 9
What moves everywhere still rests in the divine.
जैसे सब जगह विचरनेवाली महान् वायु नित्य ही आकाशमें स्थित रहती है, ऐसे ही सम्पूर्ण प्राणी मुझमें ही स्थित रहते हैं ऐसा त…
- 9.7अ. 9
What seems like ending is only a return before another beginning.
हे कुन्तीनन्दन कल्पोंका क्षय होनेपर सम्पूर्ण प्राणी मेरी प्रकृतिको प्राप्त होते हैं और कल्पोंके आदिमें मैं फिर उनकी रचन…
- 9.8अ. 9
Life unfolds through a power larger than individual will.
प्रकृतिके वशमें होनेसे परतन्त्र हुए इस सम्पूर्ण प्राणिसमुदायको मैं कल्पोंके आदिमें अपनी प्रकृतिको वशमें करके बारबार रचता…
- 9.9अ. 9
Action can continue without leaving a chain behind.
हे धनञ्जय उन सृष्टिरचना आदि कर्मोंमें अनासक्त और उदासीनकी तरह रहते हुए मेरेको वे कर्म नहीं बाँधते ॥
- 9.10अ. 9
Change is not chaotic; it unfolds within a higher order.
प्रकृति मेरी अध्यक्षतामें सम्पूर्ण चराचर जगत् को रचती है । हे कुन्तीनन्दन इसी हेतुसे जगत् का विविध प्रकारसे परिवर्तन ह…
- 9.11अ. 9
Ordinary appearance can hide the highest reality.
मूर्खलोग मेरे सम्पूर्ण प्राणियोंके महान् ईश्वररूप परमभावको न जानते हुए मुझे मनुष्यशरीरके आश्रित मानकर अर्थात् साधारण मनु…
- 9.12अ. 9
A confused mind turns even hope, effort, and learning into waste.
जिनकी सब आशाएँ व्यर्थ होती हैं, सब शुभकर्म व्यर्थ होते हैं और सब ज्ञान व्यर्थ होते हैं अर्थात् जिनकी आशाएँ, कर्म और ज्ञा…
- 9.13अ. 9
True devotion begins when the mind recognises the imperishable source.
परन्तु हे पृथानन्दन दैवी प्रकृतिके आश्रित अनन्यमनवाले महात्मालोग मुझे सम्पूर्ण प्राणियोंका आदि और अविनाशी समझकर मेरा भज…
- 9.14अ. 9
Steady devotion becomes a life of continual remembrance.
नित्य मेरेमें युक्त मनुष्य दृढ़व्रती होकर लगनपूर्वक साधनमें लगे हुए और भक्तिपूर्वक कीर्तन करते हुए तथा नमस्कार करते हुये…
- 9.15अ. 9
The same reality can be approached as one, many, or all-encompassing.
दूसरे साधक ज्ञानयज्ञके द्वारा एकीभावसे अभेदभावसे मेरा पूजन करते हुए मेरी उपासना करते हैं और दूसरे कई साधक अपनेको पृथक् म…
- 9.16अ. 9
All sacred action is already filled with the divine presence.
क्रतु मैं हूँ, यज्ञ मैं हूँ, स्वधा मैं हूँ, औषध मैं हूँ, मन्त्र मैं हूँ, घृत मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ और हवनरूप क्रिया भी …
- 9.17अ. 9
All sources of life and meaning are gathered in Krishna.
क्रतु मैं हूँ, यज्ञ मैं हूँ, स्वधा मैं हूँ, औषध मैं हूँ, मन्त्र मैं हूँ, घृत मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ और हवनरूप क्रिया भी …
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- 9.18अ. 9
Everything rests in one imperishable source.
क्रतु मैं हूँ, यज्ञ मैं हूँ, स्वधा मैं हूँ, औषध मैं हूँ, मन्त्र मैं हूँ, घृत मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ और हवनरूप क्रिया भी …
- 9.19अ. 9
Opposites do not stand outside the divine; they flow from it.
हे अर्जुन संसारके हितके लिये मैं ही सूर्यरूपसे तपता हूँ, जलको ग्रहण करता हूँ और फिर उस जलको वर्षारूपसे बरसा देता हूँ । …
- 9.20अ. 9
Rewarded devotion still keeps you bound to return.
वेदत्रयीमें कहे हुए सकाम अनुष्ठानको करनेवाले और सोमरसको पीनेवाले जो पापरहित मनुष्य यज्ञोंके द्वारा इन्द्ररूपसे मेरा पूजन…
- 9.21अ. 9
What is won by wanting is lost by time.
वे उस विशाल स्वर्गलोकके भोगोंको भोगकर पुण्य क्षीण होनेपर मृत्युलोकमें आ जाते हैं । इस प्रकार तीनों वेदोंमें कहे हुए सका…
- 9.22अ. 9
Unwavering devotion is met by unwavering support.
जो अनन्य भक्त मेरा चिन्तन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, मेरेमें निरन्तर लगे हुए उन भक्तोंका योगक्षेम अप्राप्तकी प्राप्त…
- 9.23अ. 9
All sincere worship reaches the one reality, even when the form is confused.
हे कुन्तीनन्दन जो भी भक्त मनुष्य श्रद्धापूर्वक अन्य देवताओंका पूजन करते हैं, वे भी करते हैं मेरा ही पूजन, पर करते है अवि…
- 9.24अ. 9
Every offering matters only when you know who receives it.
क्योंकि मैं ही सम्पूर्ण यज्ञोंका भोक्ता और स्वामी भी हूँ परन्तु वे मेरेको तत्त्वसे नहीं जानते, इसीसे उनका पतन होता है ॥
- 9.25अ. 9
Devotion does not stay abstract; it carries you to its chosen end.
सकामभावसे देवताओंका पूजन करनेवाले शरीर छोड़नेपर देवताओंको प्राप्त होते हैं । पितरोंका पूजन करनेवाले पितरोंको प्राप्त हो…
- 9.26अ. 9
A small offering becomes complete when devotion fills it.
जो भक्त पत्र, पुष्प, फल, जल आदि यथासाध्य प्राप्त वस्तु को भक्तिपूर्वक मेरे अर्पण करता है, उस मेरेमें तल्लीन हुए अन्तःकरण…
- 9.27अ. 9
Every action becomes complete when it is offered.
हे कुन्तीपुत्र तू जो कुछ करता है, जो कुछ खाता है, जो कुछ यज्ञ करता है, जो कुछ दान देता है और जो कुछ तप करता है, वह सब म…
- 9.28अ. 9
Freedom begins when even the result is no longer yours to carry.
इस प्रकार मेरे अर्पण करनेसे जिनसे कर्मबन्धन होता है, ऐसे शुभ विहित और अशुभ निषिद्ध सम्पूर्ण कर्मोंके फलोंसे तू मुक्त हो …
- 9.29अ. 9
Equality is universal; intimacy is born through devotion.
मैं सम्पूर्ण प्राणियोंमें समान हूँ । उन प्राणियोंमें न तो कोई मेरा द्वेषी है और न कोई प्रिय है । परन्तु जो भक्तिपूर्वक…
- 9.30अ. 9
Undivided devotion can outweigh even a deeply flawed life.
अगर कोई दुराचारीसेदुराचारी भी अनन्यभावसे मेरा भजन करता है, तो उसको साधु ही मानना चाहिये । कारण कि उसने निश्चय बहुत अच्छ…
- 9.31अ. 9
Devotion quickly changes a person and protects them from ruin.
वह तत्काल उसी क्षण धर्मात्मा हो जाता है और निरन्तर रहनेवाली शान्तिको प्राप्त हो जाता है । हे कुन्तीनन्दन तुम प्रतिज्ञा…
- 9.32अ. 9
No birth or status can block one who takes refuge.
हे पृथानन्दन जो भी पापयोनिवाले हों तथा जो भी स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र हों, वे भी सर्वथा मेरे शरण होकर निःसन्देह परमगति…
- 9.33अ. 9
What does not last cannot finally satisfy; turn your life toward the divine.
जो पवित्र आचरणवाले ब्राह्मण और ऋषिस्वरूप क्षत्रिय भगवान् के भक्त हों, वे परमगतिको प्राप्त हो जायँ, इसमें तो कहना ही क्या…
- 9.34अ. 9
Total orientation toward the divine becomes the way to reach the divine.
तू मेरा भक्त हो जा, मेरेमें मनवाला हो जा, मेरा पूजन करनेवाला हो जा और मेरेको नमस्कार कर । इस प्रकार मेरे साथ अपनेआपको ल…