अक्षर ब्रह्म योग
मृत्यु के क्षण में क्या होता है। अक्षर ब्रह्म। प्रकाश का मार्ग, धूम का मार्ग।
सभी 28 श्लोक नीचे।
Wisdom translation, edited by Ankur Shukla. Commentary AI-drafted, human-reviewed. Reviewed June 2026. Methodology →

“अर्जुन बोले हे पुरुषोत्तम वह ब्रह्म क्या है अध्यात्म क्या है कर्म क्या है अधिभूत किसको कहा गया है और अधिदैव किसको कहा जाता है यहाँ अधियज्ञ कौन है और वह इस देहमें कैसे है हे मधूसूदन नियतात्मा वशीभूत अंतःकरण वाले मनुष्यके द्वारा अन्तकालमें आप कैसे जाननेमें आते हैं ॥”पूरा श्लोक 8.1 पढ़ें →सभी श्लोक
- 8.1अ. 8
Clear seeing starts by asking what each word truly means.
अर्जुन बोले हे पुरुषोत्तम वह ब्रह्म क्या है अध्यात्म क्या है कर्म क्या है अधिभूत किसको कहा गया है और अधिदैव किसको कहा …
- 8.2अ. 8
Real understanding begins by asking what remains when life is ending.
अर्जुन बोले हे पुरुषोत्तम वह ब्रह्म क्या है अध्यात्म क्या है कर्म क्या है अधिभूत किसको कहा गया है और अधिदैव किसको कहा …
- 8.3अ. 8
What lasts, what you are, and what you do are not the same.
श्रीभगवान् बोले परम अक्षर ब्रह्म है और जीवका अपना जो होनापन है, उसको अध्यात्म कहते हैं । प्राणियों का उद्भव सत्ता को प…
- 8.4अ. 8
The changing world, the cosmic order, and the inner witness are not separate.
हे देहधारियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन क्षरभाव अर्थात् नाशवान् पदार्थको अधिभूत कहते हैं, पुरुष अर्थात् हिरण्यगर्भ ब्रह्माजी अध…
- 8.5अ. 8
The last remembered presence shapes the next state of being.
जो मनुष्य अन्तकालमें भी मेरा स्मरण करते हुए शरीर छोड़कर जाता है, वह मेरे स्वरुप को ही प्राप्त होता है, इसमें सन्देह नहीं…
- 8.6अ. 8
The end follows the state you have trained.
हे कुन्तीपुत्र अर्जुन मनुष्य अन्तकाल में जिसजिस भी भावका स्मरण करते हुए शरीर छोड़ता है वह उस अन्तकालके भावसे सदा भावित …
- 8.7अ. 8
Action and remembrance can happen together without conflict.
इसलिये तू सब समयमें मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर । मेरेमें मन और बुद्धि अर्पित करनेवाला तू निःसन्देह मेरेको ही प्राप्त …
- 8.8अ. 8
What the mind has practiced most will claim you at the end.
हे पृथानन्दन अभ्यासयोगसे युक्त और अन्यका चिन्तन न करनेवाले चित्तसे परम दिव्य पुरुषका चिन्तन करता हुआ शरीर छोड़नेवाला मन…
- 8.9अ. 8
Hold the ungraspable source in mind, not the passing form.
जो सर्वज्ञ, पुराण, शासन करनेवाला, सूक्ष्मसेसूक्ष्म, सबका धारणपोषण करनेवाला, अज्ञानसे अत्यन्त परे, सूर्यकी तरह प्रकाशस्वर…
- 8.10अ. 8
Steady devotion carries awareness beyond the body's final threshold.
वह भक्तियुक्त मनुष्य अन्तसमयमें अचल मनसे और योगबलके द्वारा भृकुटीके मध्यमें प्राणोंको अच्छी तरहसे प्रविष्ट करके शरीर छोड…
- 8.11अ. 8
The imperishable is reached by giving up desire, not by feeding it.
वेदवेत्ता लोग जिसको अक्षर कहते हैं, वीतराग यति जिसको प्राप्त करते हैं और साधक जिसकी प्राप्तिकी इच्छा करते हुए ब्रह्मचर्य…
- 8.12अ. 8
Mastery of the senses and mind prepares one for the final passage.
इन्द्रियोंके सम्पूर्ण द्वारोंको रोककर मनका हृदयमें निरोध करके और अपने प्राणोंको मस्तकमें स्थापित करके योगधारणामें सम्यक्…
- 8.13अ. 8
Final remembrance can carry consciousness beyond the body.
इन्द्रियोंके सम्पूर्ण द्वारोंको रोककर मनका हृदयमें निरोध करके और अपने प्राणोंको मस्तकमें स्थापित करके योगधारणामें सम्यक्…
- 8.14अ. 8
Constant remembrance makes the divine easy to reach.
हे पृथानन्दन अनन्यचित्तवाला जो मनुष्य मेरा नित्यनिरन्तर स्मरण करता है, उस नित्ययुक्त योगीके लिये मैं सुलभ हूँ अर्थात् उ…
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- 8.15अ. 8
True arrival ends the need to come back.
महात्मालोग मुझे प्राप्त करके दुःखालय और अशाश्वत पुनर्जन्मको प्राप्त नहीं होते क्योंकि वे परमसिद्धिको प्राप्त हो गये हैं …
- 8.16अ. 8
Even the highest attainments return, but union with Krishna does not.
हे अर्जुन ब्रह्मलोकतक सभी लोक पुनरावर्ती है परन्तु हे कौन्तेय मुझे प्राप्त होनेपर पुनर्जन्म नहीं होता ॥
- 8.17अ. 8
Cosmic time reveals how small ordinary urgency is.
जो मनुष्य ब्रह्माके एक हज़ार चतुर्युगीवाले एक दिनको और सहस्त्र चतुर्युगीपर्यन्त एक रातको जानते हैं, वे मनुष्य ब्रह्माके द…
- 8.18अ. 8
Everything formed returns to the unmanifest in time.
ब्रह्माजीके दिनके आरम्भकालमें अव्यक्त ब्रह्माजीके सूक्ष्मशरीर से सम्पूर्ण प्राणी पैदा होते हैं और ब्रह्माजीकी रातके आरम्…
- 8.19अ. 8
All formed things return and rise again under nature’s compulsion.
हे पार्थ वही यह प्राणिसमुदाय उत्पन्न होहोकर प्रकृतिके परवश हुआ ब्रह्माके दिनके समय उत्पन्न होता है और ब्रह्माकी रात्रिक…
- 8.20अ. 8
What is deepest in reality cannot be destroyed by any ending.
परन्तु उस अव्यक्त ब्रह्माजीके सूक्ष्मशरीर से अन्य अनादि सर्वश्रेष्ठ भावरूप जो अव्यक्त है, उसका सम्पूर्ण प्राणियोंके नष्ट…
- 8.21अ. 8
The highest arrival is beyond return.
उसीको अव्यक्त और अक्षर कहा गया है और उसीको परमगति कहा गया है तथा जिसको प्राप्त होनेपर जीव फिर लौटकर नहीं आते, वह मेरा पर…
- 8.22अ. 8
Undivided devotion reaches the one presence that holds all beings.
हे पृथानन्दन अर्जुन सम्पूर्ण प्राणी जिसके अन्तर्गत हैं और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, वह परम पुरुष परमात्मा तो …
- 8.23अ. 8
Not every departure leads the same way; some paths return you, others do not.
हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन जिस काल अर्थात् मार्गमें शरीर छोड़कर गये हुए योगी अनावृत्तिको प्राप्त होते हैं अर्थात् …
- 8.24अ. 8
The final passage opens for those who know the supreme reality.
जिस मार्गमें प्रकाशस्वरूप अग्निका अधिपति देवता, दिनका अधिपति देवता, शुक्लपक्षका अधिपति देवता, और छः महीनोंवाले उत्तरायणक…
- 8.25अ. 8
Some routes only delay return; they do not end the cycle.
जिस मार्गमें धूमका अधिपति देवता, रात्रिका अधिपति देवता, कृष्णपक्षका अधिपति देवता और छः महीनोंवाले दक्षिणायनका अधिपति देव…
- 8.26अ. 8
Some choices free you from the cycle; others send you back into it.
क्योंकि शुक्ल और कृष्ण ये दोनों गतियाँ अनादिकालसे जगत्प्राणिमात्र के साथ सम्बन्ध रखनेवाली मानी गई हैं । इनमेंसे एक गति…
- 8.27अ. 8
Understanding the two paths keeps the mind unshaken.
हे पृथानन्दन इन दोनों मार्गोंको जाननेवाला कोई भी योगी मोहित नहीं होता । अतः हे अर्जुन तू सब समयमें योगयुक्त हो जा ॥
- 8.28अ. 8
Knowing the way beyond rewards leads to the highest home.
योगी इसको शुक्ल और कृष्णमार्गके रहस्यको जानकर वेदोंमें, यज्ञोंमें, तपोंमें तथा दानमें जोजो पुण्यफल कहे गये हैं, उन सभी प…