विषय · 34 श्लोक

भगवद् गीता में Shraddha

श्रद्धा विश्वास है — किसी मत का नहीं, बल्कि वह विश्वास जो व्यक्ति के हर कर्म को आकार देता है। गीता सीधे कहती है: आप अपनी श्रद्धा से बने हैं। जो आप पर विश्वास करते हैं, वैसे ही बन जाते हैं।

चुने हुए 3 श्लोक — पूरा पाठ + संस्कृत ऑडियो
भगवद् गीता 3.31Speaker: Krishna
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः
अर्थ · हिन्दी
जो मनुष्य दोषदृष्टिसे रहित होकर श्रद्धापूर्वक मेरे इस पूर्वश्लोकमें वर्णित मतका सदा अनुसरण करते हैं, वे भी कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं ॥
सार
People who follow Krishna's teaching with trust and without resentment or criticism are freed from the binding effects of action.
Trusting the teaching frees action from its binding force.
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भगवद् गीता 3.32Speaker: Krishna
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः
अर्थ · हिन्दी
परन्तु जो मनुष्य मेरे इस मतमें दोषदृष्टि करते हुए इसका अनुष्ठान नहीं करते, उन सम्पूर्ण ज्ञानोंमें मोहित और अविवेकी मनुष्योंको नष्ट हुए ही समझो ॥
सार
People who reject this teaching out of fault-finding lose clear understanding and become confused. The problem is not the teaching; it is the closed mind that refuses to practise it.
Rejecting clear guidance leaves the mind stranded.
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भगवद् गीता 4.11Speaker: Krishna
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः
अर्थ · हिन्दी
हे पृथानन्दन जो भक्त जिस प्रकार मेरी शरण लेते हैं, मैं उन्हें उसी प्रकार आश्रय देता हूँ क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकारसे मेरे मार्गका अनुकरण करते हैं ॥
सार
People meet the divine according to their own approach, and the divine responds accordingly. Everyone ultimately follows that same higher path, even if they do it unconsciously.
The divine response matches the way you come forward.
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