भगवद् गीता में Yajna
यज्ञ समर्पण का कर्म है — वह अर्पण जो किसी क्रिया को उसके तात्कालिक उद्देश्य से परे ले जाता है। गीता इसे अनुष्ठान से बहुत आगे ले जाती है: ज्ञान-यज्ञ, प्राण-यज्ञ, फल की कामना का समर्पण।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंगः समाचर ॥
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥
- 3.12अ. 3
What is received must be offered back, or it becomes theft.
यज्ञसे भावित पुष्ट हुए देवता भी तुमलोगोंको बिना माँगे ही कर्तव्यपालनकी आवश्यक सामग्री देते रहेंगे । इस प्रकार उन देवताओ
- 3.13अ. 3
What is offered purifies; what is hoarded for the self corrupts.
यज्ञशेष योग का अनुभव करनेवाले श्रेष्ठ मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाते हैं । परन्तु जो केवल अपने लिये ही पकाते अर्
- 3.14अ. 3
Action sustains the cycle that makes life possible.
सम्पूर्ण प्राणी अन्नसे उत्पन्न होते हैं । अन्न वर्षासे होती है । वर्षा यज्ञसे होती है । यज्ञ कर्मोंसे निष्पन्न होता ह
- 3.15अ. 3
Right action is not random; it rests in a deeper, sustaining order.
सम्पूर्ण प्राणी अन्नसे उत्पन्न होते हैं । अन्न वर्षासे होती है । वर्षा यज्ञसे होती है । यज्ञ कर्मोंसे निष्पन्न होता ह
- 3.16अ. 3
A life detached from duty empties itself from within.
हे पार्थ जो मनुष्य इस लोकमें इस प्रकार परम्परासे प्रचलित सृष्टिचक्रके अनुसार नहीं चलता, वह इन्द्रियोंके द्वारा भोगोंमें
- 4.23अ. 4
Action loses its grip when it becomes offering, not possession.
जिसकी आसक्ति सर्वथा मिट गयी है, जो मुक्त हो गया है, जिसकी बुद्धि स्वरूपके ज्ञानमें स्थित है, ऐसे केवल यज्ञके लिये कर्म क
- 4.24अ. 4
When action is fully absorbed, even the result is not separate from Brahman.
जिस यज्ञमें अर्पण भी ब्रह्म है, हवी भी ब्रह्म है और ब्रह्मरूप कर्ताके द्वारा ब्रह्मरूप अग्निमें आहुति देनारूप क्रिया भी
- 4.25अ. 4
Sacrifice changes shape, but its aim remains surrender into the absolute.
अन्य योगीलोग भगवदर्पणरूप यज्ञका ही अनुष्ठान करते हैं और दूसरे योगीलोग ब्रह्मरूप अग्निमें विचाररूप यज्ञके द्वारा ही जीवात
- 4.26अ. 4
Restraint can consume desire before desire consumes you.
अन्य योगीलोग श्रोत्रादि समस्त इन्द्रियोंका संयमरूप अग्नियोंमें हवन किया करते हैं और दूसरे योगीलोग शब्दादि विषयोंका इन्द्
- 4.28अ. 4
Sacrifice can be wealth, effort, austerity, or study.
दूसरे कितने ही तीक्ष्ण व्रत करनेवाले प्रयत्नशील साधक द्रव्यसम्बन्धी यज्ञ करनेवाले हैं, और कितने ही तपोयज्ञ करनेवाले हैं,
- 4.29अ. 4
Breath itself can become disciplined offering.
दूसरे कितने ही प्राणायामके परायण हुए योगीलोग अपानमें प्राणका पूरक करके, प्राण और अपानकी गति रोककर फिर प्राणमें अपानका हव
- 4.30अ. 4
Discipline itself becomes offering, and offering burns away inner stain.
दूसरे कितने ही प्राणायामके परायण हुए योगीलोग अपानमें प्राणका पूरक करके, प्राण और अपानकी गति रोककर फिर प्राणमें अपानका हव
- 4.31अ. 4
A life without offering cannot even support itself.
हे कुरुवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन यज्ञसे बचे हुए अमृतका अनुभव करनेवाले सनातन परब्रह्म परमात्माको प्राप्त होते हैं । यज्
- 4.32अ. 4
Seeing every offering as action frees you from action’s binding force.
इस प्रकार और भी बहुत तरहके यज्ञ वेदकी वाणीमें विस्तारसे कहे गये हैं । उन सब यज्ञोंको तू कर्मजन्य जान । इस प्रकार जानकर
- 5.29अ. 5
Peace comes from knowing the divine receives all effort and cares for all beings.
भक्त मुझे सब यज्ञों और तपोंका भोक्ता, सम्पूर्ण लोकोंका महान् ईश्वर तथा सम्पूर्ण प्राणियोंका सुहृद् स्वार्थरहित दयालु और
- 8.28अ. 8
Knowing the way beyond rewards leads to the highest home.
योगी इसको शुक्ल और कृष्णमार्गके रहस्यको जानकर वेदोंमें, यज्ञोंमें, तपोंमें तथा दानमें जोजो पुण्यफल कहे गये हैं, उन सभी प
- 9.16अ. 9
All sacred action is already filled with the divine presence.
क्रतु मैं हूँ, यज्ञ मैं हूँ, स्वधा मैं हूँ, औषध मैं हूँ, मन्त्र मैं हूँ, घृत मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ और हवनरूप क्रिया भी
- 9.20अ. 9
Rewarded devotion still keeps you bound to return.
वेदत्रयीमें कहे हुए सकाम अनुष्ठानको करनेवाले और सोमरसको पीनेवाले जो पापरहित मनुष्य यज्ञोंके द्वारा इन्द्ररूपसे मेरा पूजन
- 9.24अ. 9
Every offering matters only when you know who receives it.
क्योंकि मैं ही सम्पूर्ण यज्ञोंका भोक्ता और स्वामी भी हूँ परन्तु वे मेरेको तत्त्वसे नहीं जानते, इसीसे उनका पतन होता है ॥
- 11.53अ. 11
The deepest vision comes through devotion, not mere accomplishment.
जिस प्रकार तुमने मुझे देखा है, इस प्रकारका चतुर्भुजरूपवाला मैं न तो वेदोंसे, न तपसे, न दानसे और न यज्ञसे ही देखा जा सकता
- 17.7अ. 17
Even sacred actions differ; their inner quality decides their worth.
आहार भी सबको तीन प्रकारका प्रिय होता है और वैसे ही यज्ञ, दान और तप भी तीन प्रकारके होते हैं अर्थात् शास्त्रीय कर्मोंमें
- 17.11अ. 17
Right action becomes pure when reward stops being the reason.
यज्ञ करना कर्तव्य है इस तरह मनको समाधान करके फलेच्छारहित मनुष्योंद्वारा जो शास्त्रविधिसे नियत यज्ञ किया जाता है, वह सात
- 17.13अ. 17
Ritual without trust becomes empty and heavy.
शास्त्रविधिसे हीन, अन्नदानसे रहित, बिना मन्त्रोंके, बिना दक्षिणाके और बिना श्रद्धाके किये जानेवाले यज्ञको तामस यज्ञ कहते
- 17.23अ. 17
Sacred action matters because it points beyond itself to what is real.
ऊँ, तत् और सत् इन तीनों नामोंसे जिस परमात्माका निर्देश किया गया है, उसी परमात्माने सृष्टिके आदिमें वेदों, ब्राह्मणों और
- 17.24अ. 17
Sacred action begins by naming the supreme reality first.
इसलिये वैदिक सिद्धान्तोंको माननेवाले पुरुषोंकी शास्त्रविधिसे नियत यज्ञ, दान और तपरूप क्रियाएँ सदा ऊँ इस परमात्माके नामका
- 17.25अ. 17
Freedom deepens when action stops demanding a private return.
तत् नामसे कहे जानेवाले परमात्माके लिये ही सब कुछ है ऐसा मानकर मुक्ति चाहनेवाले मनुष्योंद्वारा फलकी इच्छासे रहित होकर अन
- 17.27अ. 17
Steady offering makes ordinary action sacred.
यज्ञ, तप और दानरूप क्रियामें जो स्थिति निष्ठा है, वह भी सत् ऐसे कही जाती है और उस परमात्माके निमित्त किया जानेवाला कर्म
- 18.3अ. 18
Renunciation is not simple refusal; some actions must remain.
श्रीभगवान् बोले कई विद्वान् काम्यकर्मोंके त्यागको संन्यास कहते हैं और कई विद्वान् सम्पूर्ण कर्मोंके फलके त्यागको त्याग
- 18.5अ. 18
What purifies you should be done, not dropped.
यज्ञ, दान और तपरूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये, प्रत्युत उनको तो करना ही चाहिये क्योंकि यज्ञ, दान और तप ये तीनों ही