विषय · 25 श्लोक

भगवद् गीता में Cosmic Form

भगवद् गीता के 25 श्लोक जो cosmic form पर हैं — सभी अध्यायों से, क्रम में।

चुने हुए 3 श्लोक — पूरा पाठ + संस्कृत ऑडियो
भगवद् गीता 10.42Speaker: Krishna
अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्
अर्थ · हिन्दी
अथवा हे अर्जुन तुम्हें इस प्रकार बहुतसी बातें जाननेकी क्या आवश्यकता है मैं अपने किसी एक अंशसे सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त करके स्थित हूँ ॥
सार
Krishna says there is no need for endless detail: even a single part of his presence supports the entire universe.
The whole universe rests in a single fragment of the divine.
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भगवद् गीता 11.7Speaker: Krishna
इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम्
मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि
अर्थ · हिन्दी
हे नींदको जीतनेवाले अर्जुन मेरे इस शरीरके एक देशमें चराचरसहित सम्पूर्ण जगत् को अभी देख ले । इसके सिवाय तू और भी जो कुछ देखना चाहता है, वह भी देख ले ॥
सार
Krishna tells Arjuna that the whole universe, moving and still, is contained in his body. Arjuna can also look for anything else he wants to see.
Everything you seek is already gathered in the divine form.
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भगवद् गीता 11.10Speaker: Sanjaya
अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम्
अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम्
अर्थ · हिन्दी
जिसके अनेक मुख और नेत्र हैं, अनेक तहरके अद्भुत दर्शन हैं, अनेक दिव्य आभूषण हैं, हाथोंमें उठाये हुए अनेक दिव्य आयुध हैं तथा जिनके गलेमें दिव्य मालाएँ हैं, जो दिव्य वस्त्र पहने हुए हैं, जिनके ललाट तथा शरीरपर दिव्य चन्दन, कुंकुम आदि लगा हुआ है, ऐसे सम्पूर्ण आश्चर्यमय, अनन्तरूपवाले तथा चारों तरफ मुखवाले देवअपने दिव्य स्वरूप को भगवान् ने दिखाया ॥
सार
The cosmic form appears with countless faces, eyes, ornaments, and divine weapons. It is a vast, overwhelming vision rather than a single human shape.
The divine form cannot be held inside one human image.
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