भगवद् गीता में Arjuna Prayer
भगवद् गीता के 14 श्लोक जो arjuna prayer पर हैं — सभी अध्यायों से, क्रम में।
पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् ॥
न हि ते भगवन् व्यक्ितं विदुर्देवा न दानवाः ॥
याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि ॥
- 10.17अ. 10
Devotion needs a form the mind can return to again and again.
हे योगिन् हरदम साङ्गोपाङ्ग चिन्तन करता हुआ मैं आपको कैसे जानूँ और हे भगवन् किनकिन भावोंमें आप मेरे द्वारा चिन्तन किये
- 11.2अ. 11
All change is clear only beside what does not change.
हे कमलनयन सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति और प्रलय मैंने विस्तारपूर्वक आपसे ही सुना है और आपका अविनाशी माहात्म्य भी सुना
- 11.17अ. 11
What is most real cannot be fully held by sight.
मैं आपको किरीट, गदा, चक्र तथा शङ्ख और पद्म धारण किये हुए देख रहा हूँ । आपको तेजकी राशि, सब ओर प्रकाश करनेवाले, देदीप्यम
- 11.36अ. 11
The divine name can turn fear into devotion and disorder into reverence.
अर्जुन बोले हे अन्तर्यामी भगवन् आपके नाम, गुण, लीलाका कीर्तन करनेसे यह सम्पूर्ण जगत् हर्षित हो रहा है और अनुरागप्रेम क
- 11.37अ. 11
What exceeds all categories naturally draws surrender.
हे महात्मन् गुरुओंके भी गुरु और ब्रह्माके भी आदिकर्ता आपके लिये वे सिद्धगण नमस्कार क्यों नहीं करें क्योंकि हे अनन्त हे
- 11.39अ. 11
All powers and forces bow inside the one you face.
आप ही वायु, यमराज, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा, दक्ष आदि प्रजापति और प्रपितामह ब्रह्माजीके भी पिता हैं । आपको हजारों बार नमस्
- 11.41अ. 11
Familiarity without recognition becomes disrespect; awe restores the right relation.
आपकी महिमा और स्वरूपको न जानते हुए मेरे सखा हैं ऐसा मानकर मैंने प्रमादसे अथवा प्रेमसे हठपूर्वक बिना सोचेसमझे हे कृष्ण ह
- 11.42अ. 11
Familiarity can hide greatness until awe breaks through.
आपकी महिमा और स्वरूपको न जानते हुए मेरे सखा हैं ऐसा मानकर मैंने प्रमादसे अथवा प्रेमसे भी हठपूर्वक बिना सोचेसमझे हे कृष्ण
- 11.43अ. 11
Recognition of the highest power dissolves all comparison.
आप ही इस चराचर संसारके पिता हैं, आप ही पूजनीय हैं और आप ही गुरुओंके महान् गुरु हैं । हे अनन्त प्रभावशाली भगवन् इस त्रि
- 11.44अ. 11
True reverence asks forgiveness without excuses.
इसलिये शरीरसे लम्बा पड़कर स्तुति करनेयोग्य आप ईश्वरको मैं प्रणाम करके प्रसन्न करना चाहता हूँ । जैसे पिता पुत्रके, मित्र
- 11.45अ. 11
A vision can awaken joy and fear at once.
मैंने ऐसा रुप पहले कभी नहीं देखा । इस रूपको देखकर मैं हर्षित हो रहा हूँ और साथहीसाथ भयसे मेरा मन अत्यन्त व्यथित हो रहा