पुरुषोत्तम योग
संसार उल्टा वृक्ष, मूल ऊपर, शाखाएँ नीचे। वैराग्य की कुल्हाड़ी से काटो, मूल खोजो।
सभी 20 श्लोक नीचे।
Wisdom translation, edited by Ankur Shukla. Commentary AI-drafted, human-reviewed. Reviewed June 2026. Methodology →

“श्रीभगवान् बोले ऊपरकी ओर मूलवाले तथा नीचेकी ओर शाखावाले जिस संसाररूप अश्वत्थवृक्षको अव्यय कहते हैं और वेद जिसके पत्ते हैं, उस संसारवृक्षको जो जानता है, वह सम्पूर्ण वेदोंको जाननेवाला है ॥”पूरा श्लोक 15.1 पढ़ें →सभी श्लोक
- 15.1अ. 15
Understanding the world-tree is the beginning of true understanding.
श्रीभगवान् बोले ऊपरकी ओर मूलवाले तथा नीचेकी ओर शाखावाले जिस संसाररूप अश्वत्थवृक्षको अव्यय कहते हैं और वेद जिसके पत्ते ह…
- 15.2अ. 15
Craving and action keep the world-tree growing in every direction.
उस संसारवृक्षकी गुणोंसत्त्व, रज और तम के द्वारा बढ़ी हुई तथा विषयरूप कोंपलोंवाली शाखाएँ नीचे, मध्यमें और ऊपर सब जगह फैली…
- 15.3अ. 15
What traps you has no fixed form; detachment cuts it cleanly.
इस संसारवृक्षका जैसा रूप देखनेमें आता है, वैसा यहाँ विचार करनेपर मिलता नहीं क्योंकि इसका न तो आदि है, न अन्त है और न स्थ…
- 15.4अ. 15
The final refuge is a state where return itself stops.
उसके बाद उस परमपदपरमात्मा की खोज करनी चाहिये जिसको प्राप्त होनेपर मनुष्य फिर लौटकर संसारमें नहीं आते और जिससे अनादिकालसे…
- 15.5अ. 15
Freedom begins when pride, craving, and inner division fall away.
जो मान और मोहसे रहित हो गये हैं, जिन्होंने आसक्तिसे होनेवाले दोषोंको जीत लिया है, जो नित्यनिरन्तर परमात्मामें ही लगे हुए…
- 15.6अ. 15
The highest home is beyond every ordinary light and beyond return.
उसपरमपद को न सूर्य, न चन्द्र और न अग्नि ही प्रकाशित कर सकती है और जिसको प्राप्त होकर जीव लौटकर संसारमें नहीं आते, वही मे…
- 15.7अ. 15
What is eternal gets pulled around by what changes.
इस संसारमें जीव बना हुआ आत्मा मेरा ही सनातन अंश है परन्तु वह प्रकृतिमें स्थित मन और पाँचों इन्द्रियोंको आकर्षित करता है …
- 15.8अ. 15
The body changes, but the carried pattern moves on.
जैसे वायु गन्धके स्थानसे गन्धको ग्रहण करके ले जाती है, ऐसे ही शरीरादिका स्वामी बना हुआ जीवात्मा भी जिस शरीरको छोड़ता है,…
- 15.9अ. 15
Experience passes through mind and senses; it does not define the true self.
यह जीवात्मा मनका आश्रय लेकर श्रोत्र, नेत्र, त्वचा, रसना और घ्राण इन पाँचों इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका सेवन करता है ॥
- 15.10अ. 15
What changes is seen by the wise; the true self is not what moves.
शरीरको छोड़कर जाते हुए या दूसरे शरीरमें स्थित हुए अथवा विषयोंको भोगते हुए भी गुणोंसे युक्त जीवात्माके स्वरूपको मूढ़ मनुष…
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- 15.11अ. 15
Seeing the supreme reality depends on inner purification, not effort alone.
यत्न करनेवाले योगीलोग अपनेआपमें स्थित इस परमात्मतत्त्वका अनुभव करते हैं । परन्तु जिन्होंने अपना अन्तःकरण शुद्ध नहीं किय…
- 15.12अ. 15
Every brightness in the world points back to one source.
सूर्यमें आया हुआ जो तेज सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है और जो तेज चन्द्रमामें है तथा जो तेज अग्निमें है, उस तेजको मेरा…
- 15.13अ. 15
Life is nourished from within by the same presence that holds it together.
मैं ही पृथ्वीमें प्रविष्ट होकर अपनी शक्तिसे समस्त प्राणियोंको धारण करता हूँ और मैं ही रसमय चन्द्रमाके रूपमें समस्त ओषधिय…
- 15.14अ. 15
The divine is already working inside your body as life itself.
प्राणियोंके शरीरमें रहनेवाला मैं प्राणअपानसे युक्त वैश्वानर होकर चार प्रकारके अन्नको पचाता हूँ ॥
- 15.15अ. 15
The deepest knowing comes from the one already dwelling within every heart.
मैं सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें स्थित हूँ । मेरेसे ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन संशय आदि दोषोंका नाश होता है । सम्पूर्ण …
- 15.16अ. 15
What changes is not the whole of you.
इस संसारमें क्षर नाशवान् और अक्षर अविनाशी ये दो प्रकारके पुरुष हैं । सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीर नाशवान् और कूटस्थ जीवात…
- 15.17अ. 15
Even the imperishable witness is not the final reality.
उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जो परमात्मा नामसे कहा गया है । वही अविनाशी ईश्वर तीनों लोकोंमें प्रविष्ट होकर सबका भरणपोषण क…
- 15.18अ. 15
The highest reality lies beyond both change and permanence.
मैं क्षरसे अतीत हूँ और अक्षरसे भी उत्तम हूँ, इसलिये लोकमें और वेदमें पुरुषोत्तम नामसे प्रसिद्ध हूँ ॥
- 15.19अ. 15
Clear seeing of the Supreme Self becomes total devotion.
हे भरतवंशी अर्जुन इस प्रकार जो मोहरहित मनुष्य मुझे पुरुषोत्तम जानता है, वह सर्वज्ञ सब प्रकारसे मेरा ही भजन करता है ॥
- 15.20अ. 15
Secret knowledge makes a person complete.
हे निष्पाप अर्जुन इस प्रकार यह अत्यन्त गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया है । हे भरतवंशी अर्जुन इसको जानकर मनुष्य ज्…