भगवद् गीता में Sharanagati
भगवद् गीता के 13 श्लोक जो sharanagati पर हैं — सभी अध्यायों से, क्रम में।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्िचतं ब्रूहि तन्मेशिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥
- 9.32अ. 9
No birth or status can block one who takes refuge.
हे पृथानन्दन जो भी पापयोनिवाले हों तथा जो भी स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र हों, वे भी सर्वथा मेरे शरण होकर निःसन्देह परमगति
- 11.4अ. 11
Real vision begins when control gives way to asking.
हे प्रभो मेरे द्वारा आपका वह परम ऐश्वर रूप देखा जा सकता है ऐसा अगर आप मानते हैं, तो हे योगेश्वर आप अपने उस अविनाशी स्
- 11.33अ. 11
Act fully, but let the larger order carry the result.
इसलिये तुम युद्धके लिये खड़े हो जाओ और यशको प्राप्त करो तथा शत्रुओंको जीतकर धनधान्यसे सम्पन्न राज्यको भोगो । ये सभी मेर
- 18.56अ. 18
Continuous action and complete refuge can lead to the same unchanging state.
मेरा आश्रय लेनेवाला भक्त सदा सब कर्म करता हुआ भी मेरी कृपासे शाश्वत अविनाशी पदको प्राप्त हो जाता है ॥
- 18.57अ. 18
Hand over the action, and let the mind stay gathered there.
चित्तसे सम्पूर्ण कर्म मुझमें अर्पण करके, मेरे परायण होकर तथा समताका आश्रय लेकर निरन्तर मुझमें चित्तवाला हो जा ॥
- 18.58अ. 18
Grace opens the way; ego closes it.
मेरेमें चित्तवाला होकर तू मेरी कृपासे सम्पूर्ण विघ्नोंको तर जायगा और यदि तू अहंकारके कारण मेरी बात नहीं सुनेगा तो तेरा प
- 18.62अ. 18
Wholehearted surrender opens the door to lasting peace.
हे भरतवंशोद्भव अर्जुन तू सर्वभावसे उस ईश्वरकी ही शरणमें चला जा । उसकी कृपासे तू परमशान्तिसंसारसे सर्वथा उपरति को और अव
- 18.63अ. 18
True guidance ends by returning choice to you.
यह गुह्यसे भी गुह्यतर शरणागतिरूप ज्ञान मैंने तुझे कह दिया । अब तू इसपर अच्छी तरहसे विचार करके जैसा चाहता है, वैसा कर ॥
- 18.64अ. 18
The deepest teaching is spoken as care, not command.
सबसे अत्यन्त गोपनीय वचन तू फिर मेरेसे सुन । तू मेरा अत्यन्त प्रिय है, इसलिये मैं तेरे हितकी बात कहूँगा ॥
- 18.66अ. 18
Total refuge ends the burden of fear.
सम्पूर्ण धर्मोंका आश्रय छोड़कर तू केवल मेरी शरणमें आ जा । मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा, चिन्ता मत कर ॥