विषय · 31 श्लोक

भगवद् गीता में Prakriti

प्रकृति वह समस्त प्रकट सत्ता है — जो कुछ भी उठता, बदलता और मिटता है। गीता सिखाती है कि आप जो देखते, अनुभव करते और सोचते हैं वह सब प्रकृति से उठता है। और पुरुष — चेतन साक्षी — उससे अलग है। यही पहचान मुक्ति का आरम्भ है।

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भगवद् गीता 3.5Speaker: Krishna
हि कश्िचत्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः
अर्थ · हिन्दी
कोई भी मनुष्य किसी भी अवस्थामें क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता क्योंकि प्रकृतिके परवश हुए सब प्राणियोंसे प्रकृतिजन्य गुण कर्म कराते हैं ॥
सार
No one can stay inactive forever. The qualities of nature keep pushing every person into action.
Inaction is an illusion; nature is already moving you.
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भगवद् गीता 3.27Speaker: Krishna
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते
अर्थ · हिन्दी
सम्पूर्ण कर्म सब प्रकारसे प्रकृतिके गुणोंद्वारा किये जाते हैं परन्तु अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाला अज्ञानी मनुष्य मैं कर्ता हूँ ऐसा मानता है ॥
सार
Actions happen through the forces of nature, not through the false sense of 'I am the doer.' Ego creates the illusion of authorship.
The doer is imagined; action belongs to nature's forces.
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भगवद् गीता 3.33Speaker: Krishna
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति
अर्थ · हिन्दी
सम्पूर्ण प्राणी प्रकृतिको प्राप्त होते हैं । ज्ञानी महापुरुष भी अपनी प्रकृतिके अनुसार चेष्टा करता है । फिर इसमें किसीका हठ क्या करेगा ॥
सार
Even a wise person acts according to their own nature. Every living being follows its nature, so force alone cannot change that.
Nature drives behavior; force alone cannot overrule it.
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