विषय · 31 श्लोक
भगवद् गीता में Prakriti
भगवद् गीता के 31 श्लोक जो prakriti पर हैं — सभी अध्यायों से, क्रम में।
- 3.5कोई भी मनुष्य किसी भी अवस्थामें क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता क्योंकि प्रकृतिके परवश हुए सब प्राणियोंसे प्रकृतिजन्य गुण कर्म करात
- 3.27सम्पूर्ण कर्म सब प्रकारसे प्रकृतिके गुणोंद्वारा किये जाते हैं परन्तु अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाला अज्ञानी मनुष्य मैं कर्ता हूँ ऐसा मानता है
- 3.33सम्पूर्ण प्राणी प्रकृतिको प्राप्त होते हैं । ज्ञानी महापुरुष भी अपनी प्रकृतिके अनुसार चेष्टा करता है । फिर इसमें किसीका हठ क्या करेगा ॥
- 4.6मैं अजन्मा और अविनाशीस्वरूप होते हुए भी तथा सम्पूर्ण प्राणियोंका ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृतिको अधीन करके अपनी योगमायासे प्रकट होता हूँ ॥
- 5.14परमेश्वर मनुष्योंके न कर्तापनकी, न कर्मोंकी और न कर्मफलके साथ संयोगकी रचना करते हैं किन्तु स्वभाव ही बरत रहा है ॥
- 7.4पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश ये पञ्चमहाभूत और मन, बुद्धि तथा अहंकार यह आठ प्रकारके भेदोंवाली मेरी अपरा प्रकृति है । हे महाबाहो इस अपरा प्
- 7.5पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश ये पञ्चमहाभूत और मन, बुद्धि तथा अहंकार यह आठ प्रकारके भेदोंवाली मेरी अपरा प्रकृति है । हे महाबाहो इस अपरा प्
- 7.6अपरा और परा इन दोनों प्रकृतियोंके संयोगसे ही सम्पूर्ण प्राणी उत्पन्न होते हैं, ऐसा तुम समझो । मैं सम्पूर्ण जगत् का प्रभव तथा प्रलय हूँ ॥
- 7.9पृथ्वीमें पवित्र गन्ध मैं हूँ, और अग्निमें तेज मैं हूँ, तथा सम्पूर्ण प्राणियोंमें जीवनीशक्ति मैं हूँ और तपस्वियोंमें तपस्या मैं हूँ ॥
- 7.20उनउन कामनाओंसे जिनका ज्ञान अपहृत हो गया है, ऐसे वे मनुष्य अपनीअपनी प्रकृतिसे नियन्त्रित होकर देवताओंके उनउन नियमोंको धारण करते हुए उनउन देवत
- 8.19हे पार्थ वही यह प्राणिसमुदाय उत्पन्न होहोकर प्रकृतिके परवश हुआ ब्रह्माके दिनके समय उत्पन्न होता है और ब्रह्माकी रात्रिके समय लीन होता है ॥
- 9.7हे कुन्तीनन्दन कल्पोंका क्षय होनेपर सम्पूर्ण प्राणी मेरी प्रकृतिको प्राप्त होते हैं और कल्पोंके आदिमें मैं फिर उनकी रचना करता हूँ ॥
- 9.8प्रकृतिके वशमें होनेसे परतन्त्र हुए इस सम्पूर्ण प्राणिसमुदायको मैं कल्पोंके आदिमें अपनी प्रकृतिको वशमें करके बारबार रचता हूँ ॥
- 9.9हे धनञ्जय उन सृष्टिरचना आदि कर्मोंमें अनासक्त और उदासीनकी तरह रहते हुए मेरेको वे कर्म नहीं बाँधते ॥
- 9.10प्रकृति मेरी अध्यक्षतामें सम्पूर्ण चराचर जगत् को रचती है । हे कुन्तीनन्दन इसी हेतुसे जगत् का विविध प्रकारसे परिवर्तन होता है ॥
- 13.1श्रीभगवान् बोलेहे कुन्तीपुत्र अर्जुन यहरूपसे कहे जानेवाले शरीरको क्षेत्र कहते हैं और इस क्षेत्रको जो जानता है, उसको ज्ञानीलोग क्षेत्रज्ञ ना
- 13.20प्रकृति और पुरुष दोनोंको ही तुम अनादि समझो और विकारों तथा गुणोंको भी प्रकृतिसे ही उत्पन्न समझो । कार्य और करणके द्वारा होनेवाली क्रियाओंको
- 13.21प्रकृति और पुरुष दोनोंको ही तुम अनादि समझो और विकारों तथा गुणोंको भी प्रकृतिसे ही उत्पन्न समझो । कार्य और करणके द्वारा होनेवाली क्रियाओंको
- 13.22प्रकृतिमें स्थित पुरुष ही प्रकृतिजन्य गुणोंका भोक्ता बनता है और गुणोंका सङ्ग ही उसके ऊँचनीच योनियोंमें जन्म लेनेका कारण बनता है ॥
- 13.23यह पुरुष प्रकृतिशरीर के साथ सम्बन्ध रखनेसे उपद्रष्टा, उसके साथ मिलकर सम्मति, अनुमति देनेसे अनुमन्ता, अपनेको उसका भरणपोषण करनेवाला माननेसे भर
- 13.24इस प्रकार पुरुषको और गुणोंके सहित प्रकृतिको जो मनुष्य अलगअलग जानता है, वह सब तरहका बर्ताव करता हुआ भी फिर जन्म नहीं लेता ॥
- 13.30जो सम्पूर्ण क्रियाओंको सब प्रकारसे प्रकृतिके द्वारा ही की जाती हुई देखता है और अपनेआपको अकर्ता देखता अनुभव करता है, वही यथार्थ देखता है ॥
- 13.35इस प्रकार जो ज्ञानरूपी नेत्रसे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके अन्तरविभाग को तथा कार्यकारणसहित प्रकृतिसे स्वयंको अलग जानते हैं, वे परमात्माको प्राप्
- 14.3हे भरतवंशोद्भव अर्जुन मेरी मूल प्रकृति तो उत्पत्तिस्थान है और मैं उसमें जीवरूप गर्भका स्थापन करता हूँ । उससे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति
- 14.4हे कुन्तीनन्दन सम्पूर्ण योनियोंमें प्राणियोंके जितने शरीर पैदा होते हैं, उन सबकी मूल प्रकृति तो माता है और मैं बीजस्थापन करनेवाला पिता हूँ
- 14.5हे महाबाहो प्रकृतिसे उत्पन्न होनेवाले सत्त्व, रज और तम ये तीनों गुण अविनाशी देहीको देहमें बाँध देते हैं ॥
- 14.6हे पापरहित अर्जुन उन गुणोंमें सत्त्वगुण निर्मल स्वच्छ होनेके कारण प्रकाशक और निर्विकार है । वह सुख और ज्ञानकी आसक्तिसे देहीको बाँधता है ॥
- 14.7हे कुन्तीनन्दन तृष्णा और आसक्तिको पैदा करनेवाले रजोगुणको तुम रागस्वरूप समझो । वह कर्मोंकी आसक्तिसे शरीरधारीको बाँधता है ॥
- 14.19जब विवेकी विचारकुशल मनुष्य तीनों गुणोंके सिवाय अन्य किसीको कर्ता नहीं देखता और अपनेको गुणोंसे पर अनुभव करता है, तब वह मेरे स्वरूपको प्राप्त
- 15.7इस संसारमें जीव बना हुआ आत्मा मेरा ही सनातन अंश है परन्तु वह प्रकृतिमें स्थित मन और पाँचों इन्द्रियोंको आकर्षित करता है अपना मान लेता है ॥
- 18.40पृथ्वीमें या स्वर्गमें अथवा देवताओंमें तथा इनके सिवाय और कहीं भी वह ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो प्रकृतिसे उत्पन्न इन तीनों गुणोंसे रहित हो ॥