विषय · 14 श्लोक

भगवद् गीता में Kshetra

भगवद् गीता के 14 श्लोक जो kshetra पर हैं — सभी अध्यायों से, क्रम में।

चुने हुए 3 श्लोक — पूरा पाठ + संस्कृत ऑडियो
भगवद् गीता 5.18Speaker: Krishna
विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि
शुनि चैव श्वपाके पण्डिताः समदर्शिनः
अर्थ · हिन्दी
ज्ञानी महापुरुष विद्याविनययुक्त ब्राह्मणमें और चाण्डालमें तथा गाय, हाथी एवं कुत्तेमें भी समरूप परमात्माको देखनेवाले होते हैं ॥
सार
A truly wise person does not rank living beings by status, species, or social position. The same reality is seen in all of them.
Real wisdom erases rank and reveals sameness.
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भगवद् गीता 13.1Speaker: Arjuna
अर्जुन उवाचप्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव
एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं केशव
अर्थ · हिन्दी
श्रीभगवान् बोलेहे कुन्तीपुत्र अर्जुन यहरूपसे कहे जानेवाले शरीरको क्षेत्र कहते हैं और इस क्षेत्रको जो जानता है, उसको ज्ञानीलोग क्षेत्रज्ञ नामसे कहते हैं ॥
सार
Arjuna asks Krishna to explain nature, the body as the field, the knower of that field, wisdom, and the object of knowledge.
Real knowing starts by separating the seen from the seer.
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भगवद् गीता 13.2Speaker: Krishna
श्री भगवानुवाचइदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः
अर्थ · हिन्दी
श्रीभगवान् बोले हे कुन्तीपुत्र अर्जुन यह रूपसे कहे जानेवाले शरीरको क्षेत्र कहते हैं और इस क्षेत्रको जो जानता है, उसको ज्ञानीलोग क्षेत्रज्ञ नामसे कहते हैं ॥
सार
The body is the field where life unfolds. The one who knows the body is called the knower of the field.
The body is observed; the knower is something else.
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