विषय · 19 श्लोक

भगवद् गीता में Indriya

भगवद् गीता के 19 श्लोक जो indriya पर हैं — सभी अध्यायों से, क्रम में।

चुने हुए 3 श्लोक — पूरा पाठ + संस्कृत ऑडियो
भगवद् गीता 2.59Speaker: Krishna
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते
अर्थ · हिन्दी
निराहारी इन्द्रियोंको विषयोंसे हटानेवाले मनुष्यके भी विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, पर रस निवृत्त नहीं होता । परन्तु इस स्थितप्रज्ञ मनुष्यका तो रस भी परमात्मतत्त्वका अनुभव होनेसे निवृत्त हो जाता है ॥
सार
Stopping the senses is not enough. The outer attraction may fade, but the inner taste remains until a higher reality is directly seen.
Craving ends only when a higher reality becomes more compelling.
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भगवद् गीता 2.60Speaker: Krishna
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः
अर्थ · हिन्दी
हे कुन्तीनन्दन रसबुद्धि रहनेसे यत्न करते हुए विद्वान् मनुष्यकी भी प्रमथनशील इन्द्रियाँ उसके मनको बलपूर्वक हर लेती हैं ॥
सार
Even a thoughtful person who is trying hard can lose control when the senses become restless and drag the mind away.
Restraint fails without disciplined senses.
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भगवद् गीता 2.62Speaker: Krishna
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते
सङ्गात् संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते
अर्थ · हिन्दी
विषयोंका चिन्तन करनेवाले मनुष्यकी उन विषयोंमें आसक्ति पैदा हो जाती है । आसक्तिसे कामना पैदा होती है । कामनासे क्रोध पैदा होता है । क्रोध होनेपर सम्मोह मूढ़भाव हो जाता है । सम्मोहसे स्मृति भ्रष्ट हो जाती है । स्मृति भ्रष्ट होनेपर बुद्धिका नाश हो जाता है । बुद्धिका नाश होनेपर मनुष्यका पतन हो जाता है ॥
सार
Fixating on pleasures or objects creates attachment. Attachment turns into wanting, and wanting turns into anger when blocked.
What you dwell on becomes what you cling to, then what burns you.
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