भगवद् गीता में Delusion
भगवद् गीता के 19 श्लोक जो delusion पर हैं — सभी अध्यायों से, क्रम में।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ॥
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ॥
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥
- 2.72अ. 2
Steadiness in the supreme reality ends confusion, even at life’s edge.
हे पृथानन्दन यह ब्राह्मी स्थिति है । इसको प्राप्त होकर कभी कोई मोहित नहीं होता । इस स्थितिमें यदि अन्तकालमें भी स्थित
- 3.29अ. 3
Clarity should guide confusion, not crush it.
प्रकृतिजन्य गुणोंसे अत्यन्त मोहित हुए अज्ञानी मनुष्य गुणों और कर्मोंमें आसक्त रहते हैं । उन पूर्णतया न समझनेवाले मन्दबु
- 5.15अ. 5
Ignorance, not action, is what keeps beings confused.
सर्वव्यापी परमात्मा न किसीके पापकर्मको और न शुभकर्मको ही ग्रहण करता है किन्तु अज्ञानसे ज्ञान ढका हुआ है, उसीसे सब जीव मो
- 7.15अ. 7
A corrupted mind cannot recognise what would free it.
मायाके द्वारा अपहृत ज्ञानवाले, आसुर भावका आश्रय लेनेवाले और मनुष्योंमें महान् नीच तथा पापकर्म करनेवाले मूढ़ मनुष्य मेरे
- 7.25अ. 7
The hidden divine is missed by confused seeing, not by absence.
जो मूढ़ मनुष्य मेरेको अज और अविनाशी ठीक तरहसे नहीं जानते मानते, उन सबके सामने योगमायासे अच्छी तरहसे आवृत हुआ मैं प्रकट न
- 8.27अ. 8
Understanding the two paths keeps the mind unshaken.
हे पृथानन्दन इन दोनों मार्गोंको जाननेवाला कोई भी योगी मोहित नहीं होता । अतः हे अर्जुन तू सब समयमें योगयुक्त हो जा ॥
- 9.12अ. 9
A confused mind turns even hope, effort, and learning into waste.
जिनकी सब आशाएँ व्यर्थ होती हैं, सब शुभकर्म व्यर्थ होते हैं और सब ज्ञान व्यर्थ होते हैं अर्थात् जिनकी आशाएँ, कर्म और ज्ञा
- 10.3अ. 10
Clear recognition of the divine ends confusion and frees action.
जो मनुष्य मुझे अजन्मा, अनादि और सम्पूर्ण लोकोंका महान् ईश्वर जानता है अर्थात् दृढ़तासे मानता है, वह मनुष्योंमें असम्मूढ़
- 14.13अ. 14
Darkness does not stay still; it breeds neglect and confusion.
हे कुरुनन्दन तमोगुणके बढ़नेपर अप्रकाश, अप्रवृत्ति, प्रमाद और मोह ये वृत्तियाँ भी पैदा होती हैं ॥
- 14.17अ. 14
Your mental weather has causes: clarity, craving, and confusion each grow from different qualities.
सत्त्वगुणसे ज्ञान और रजोगुणसे लोभ आदि ही उत्पन्न होते हैं तमोगुणसे प्रमाद, मोह एवं अज्ञान भी उत्पन्न होता है ॥
- 16.14अ. 16
Ego turns achievement into delusion and mistakes possession for mastery.
वह शत्रु तो हमारे द्वारा मारा गया और उन दूसरे शत्रुओंको भी हम मार डालेंगे । हम सर्वसमर्थ हैं । हमारे पास भोगसामग्री बह
- 16.16अ. 16
Desire scatters the mind, and confusion turns that scattering into a fall.
कामनाओंके कारण तरहतरहसे भ्रमित चित्तवाले, मोहजालमें अच्छी तरहसे फँसे हुए तथा पदार्थों और भोगोंमें अत्यन्त आसक्त रहनेवाले
- 16.20अ. 16
Repeated delusion keeps pulling a person farther from the divine.
हे कुन्तीनन्दन वे मूढ मनुष्य मेरेको प्राप्त न करके ही जन्मजन्मान्तरमें आसुरी योनिको प्राप्त होते हैं, फिर उससे भी अधिक
- 18.25अ. 18
Blind action begins where clear seeing is absent.
जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और सामर्थ्यको न देखकर मोहपूर्वक आरम्भ किया जाता है, वह तामस कहा जाता है ॥
- 18.39अ. 18
Pleasure that dulls you is not relief; it is confusion in disguise.
निद्रा, आलस्य और प्रमादसे उत्पन्न होनेवाला जो सुख आरम्भमें और परिणाममें अपनेको मोहित करनेवाला है, वह सुख तामस कहा गया है
- 18.72अ. 18
True listening should end confusion, not just collect words.
हे पृथानन्दन क्या तुमने एकाग्रचित्तसे इसको सुना और हे धनञ्जय क्या तुम्हारा अज्ञानसे उत्पन्न मोह नष्ट हुआ ॥