भगवद् गीता में Karma Sannyasa
भगवद् गीता के 11 श्लोक जो karma sannyasa पर हैं — सभी अध्यायों से, क्रम में।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति ॥
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥
- 5.8अ. 5
Seeing life happen is not the same as claiming it.
तत्त्वको जाननेवाला सांख्ययोगी देखता, सुनता, छूता, सूँघता, खाता, चलता, ग्रहण करता, बोलता, मलमूत्र का त्याग करता, सोता, श्
- 5.9अ. 5
Action happens; ownership is the illusion.
तत्त्वको जाननेवाला सांख्ययोगी देखता, सुनता, छूता, सूँघता, खाता, चलता, ग्रहण करता, बोलता, मलमूत्र का त्याग करता, सोता हुआ
- 5.13अ. 5
Freedom begins when action no longer feels personally owned.
जिसकी इन्द्रियाँ और मन वशमें हैं, ऐसा देहधारी पुरुष नौ द्वारोंवाले शरीररूपी पुरमें सम्पूर्ण कर्मोंका विवेकपूर्वक मनसे त्
- 5.17अ. 5
Complete alignment with the supreme reality ends the cycle of return.
जिनकी बुद्धि तदाकार हो रही है, जिनका मन तदाकार हो रहा है, जिनकी स्थिति परमात्मतत्वमें है, ऐसे परमात्मपरायण साधक ज्ञानके
- 5.19अ. 5
Sameness of mind is the real conquest; everything else is aftermath.
जिनका अन्तःकरण समतामें स्थित है, उन्होंने इस जीवितअवस्थामें ही सम्पूर्ण संसारको जीत लिया है ब्रह्म निर्दोष और सम है, इसल
- 5.25अ. 5
Freedom arrives when doubt ends and life turns toward all beings.
जिनका शरीर मनबुद्धिइन्द्रियोंसहित वशमें है, जो सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें रत हैं, जिनके सम्पूर्ण संशय मिट गये हैं, जिनक
- 12.6अ. 12
Total devotion turns every action into worship.
परन्तु जो कर्मोंको मेरे अर्पण करके और मेरे परायण होकर अनन्ययोगसे मेरा ही ध्यान करते हुए मेरी उपासना करते हैं ॥
- 18.57अ. 18
Hand over the action, and let the mind stay gathered there.
चित्तसे सम्पूर्ण कर्म मुझमें अर्पण करके, मेरे परायण होकर तथा समताका आश्रय लेकर निरन्तर मुझमें चित्तवाला हो जा ॥