विषय · 10 श्लोक
भगवद् गीता में Avyakta
भगवद् गीता के 10 श्लोक जो avyakta पर हैं — सभी अध्यायों से, क्रम में।
- 2.25यह देही प्रत्यक्ष नहीं दीखता, यह चिन्तनका विषय नहीं है और यह निर्विकार कहा जाता है । अतः इस देहीको ऐसा जानकर शोक नहीं करना चाहिये ॥
- 7.24बुद्धिहीन मनुष्य मेरे सर्वश्रेष्ठ अविनाशी परमभावको न जानते हुए अव्यक्त मनइन्द्रियोंसे पर मुझ सच्चिदानन्दघन परमात्माको मनुष्यकी तरह ही शरीर ध
- 8.18ब्रह्माजीके दिनके आरम्भकालमें अव्यक्त ब्रह्माजीके सूक्ष्मशरीर से सम्पूर्ण प्राणी पैदा होते हैं और ब्रह्माजीकी रातके आरम्भकालमें उसी अव्यक्तम
- 8.19हे पार्थ वही यह प्राणिसमुदाय उत्पन्न होहोकर प्रकृतिके परवश हुआ ब्रह्माके दिनके समय उत्पन्न होता है और ब्रह्माकी रात्रिके समय लीन होता है ॥
- 8.20परन्तु उस अव्यक्त ब्रह्माजीके सूक्ष्मशरीर से अन्य अनादि सर्वश्रेष्ठ भावरूप जो अव्यक्त है, उसका सम्पूर्ण प्राणियोंके नष्ट होनेपर भी नाश नहीं
- 8.21उसीको अव्यक्त और अक्षर कहा गया है और उसीको परमगति कहा गया है तथा जिसको प्राप्त होनेपर जीव फिर लौटकर नहीं आते, वह मेरा परमधाम है ॥
- 9.4यह सब संसार मेरे निराकार स्वरूपसे व्याप्त है । सम्पूर्ण प्राणी मेरेमें स्थित हैं परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ तथा वे प्राणी भी मुझ में स
- 12.1जो भक्त इस प्रकार निरन्तर आपमें लगे रहकर आपसगुण भगवान् की उपासना करते हैं और जो अविनाशी निराकारकी ही उपासना करते हैं, उनमेंसे उत्तम योगवेत्त
- 12.3जो अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके अचिन्त्य, सब जगह परिपूर्ण, अनिर्देश्य, कूटस्थ, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्तकी उपासना करते हैं, वे प्राणिमात्
- 12.5अव्यक्तमें आसक्त चित्तवाले उन साधकोंको अपने साधनमें कष्ट अधिक होता है क्योंकि देहाभिमानियोंके द्वारा अव्यक्तविषयक गति कठिनतासे प्राप्त की जा