विषय · 14 श्लोक
भगवद् गीता में Purushottama
भगवद् गीता के 14 श्लोक जो purushottama पर हैं — सभी अध्यायों से, क्रम में।
- 10.15हे भूतभावन हे भूतेश हे देवदेव हे जगत्पते हे पुरुषोत्तम आप स्वयं ही अपनेआपसे अपनेआपको जानते हैं ॥
- 10.42अथवा हे अर्जुन तुम्हें इस प्रकार बहुतसी बातें जाननेकी क्या आवश्यकता है मैं अपने किसी एक अंशसे सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त करके स्थित हूँ ॥
- 14.20देहधारी विवेकी मनुष्य देहको उत्पन्न करनेवाले इन तीनों गुणोंका अतिक्रमण करके जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्थारूप दुःखोंसे रहित हुआ अमरताका अनुभव क
- 15.1श्रीभगवान् बोले ऊपरकी ओर मूलवाले तथा नीचेकी ओर शाखावाले जिस संसाररूप अश्वत्थवृक्षको अव्यय कहते हैं और वेद जिसके पत्ते हैं, उस संसारवृक्षको
- 15.4उसके बाद उस परमपदपरमात्मा की खोज करनी चाहिये जिसको प्राप्त होनेपर मनुष्य फिर लौटकर संसारमें नहीं आते और जिससे अनादिकालसे चली आनेवाली यह सृष्
- 15.5जो मान और मोहसे रहित हो गये हैं, जिन्होंने आसक्तिसे होनेवाले दोषोंको जीत लिया है, जो नित्यनिरन्तर परमात्मामें ही लगे हुए हैं, जो अपनी दृष्टि
- 15.6उसपरमपद को न सूर्य, न चन्द्र और न अग्नि ही प्रकाशित कर सकती है और जिसको प्राप्त होकर जीव लौटकर संसारमें नहीं आते, वही मेरा परमधाम है ॥
- 15.7इस संसारमें जीव बना हुआ आत्मा मेरा ही सनातन अंश है परन्तु वह प्रकृतिमें स्थित मन और पाँचों इन्द्रियोंको आकर्षित करता है अपना मान लेता है ॥
- 15.10शरीरको छोड़कर जाते हुए या दूसरे शरीरमें स्थित हुए अथवा विषयोंको भोगते हुए भी गुणोंसे युक्त जीवात्माके स्वरूपको मूढ़ मनुष्य नहीं जानते, ज्ञान
- 15.11यत्न करनेवाले योगीलोग अपनेआपमें स्थित इस परमात्मतत्त्वका अनुभव करते हैं । परन्तु जिन्होंने अपना अन्तःकरण शुद्ध नहीं किया है, ऐसे अविवेकी मन
- 15.17उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जो परमात्मा नामसे कहा गया है । वही अविनाशी ईश्वर तीनों लोकोंमें प्रविष्ट होकर सबका भरणपोषण करता है ॥
- 15.18मैं क्षरसे अतीत हूँ और अक्षरसे भी उत्तम हूँ, इसलिये लोकमें और वेदमें पुरुषोत्तम नामसे प्रसिद्ध हूँ ॥
- 15.19हे भरतवंशी अर्जुन इस प्रकार जो मोहरहित मनुष्य मुझे पुरुषोत्तम जानता है, वह सर्वज्ञ सब प्रकारसे मेरा ही भजन करता है ॥
- 15.20हे निष्पाप अर्जुन इस प्रकार यह अत्यन्त गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया है । हे भरतवंशी अर्जुन इसको जानकर मनुष्य ज्ञानवान् तथा प्राप्तप