विषय · 11 श्लोक

भगवद् गीता में Omnipresence

भगवद् गीता के 11 श्लोक जो omnipresence पर हैं — सभी अध्यायों से, क्रम में।

चुने हुए 3 श्लोक — पूरा पाठ + संस्कृत ऑडियो
भगवद् गीता 9.4Speaker: Krishna
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना
मत्स्थानि सर्वभूतानि चाहं तेष्ववस्थितः
अर्थ · हिन्दी
यह सब संसार मेरे निराकार स्वरूपसे व्याप्त है । सम्पूर्ण प्राणी मेरेमें स्थित हैं परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ तथा वे प्राणी भी मुझ में स्थित नहीं हैं मेरे इस ईश्वरसम्बन्धी योगसामर्थ्य को देख सम्पूर्ण प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाला और उनका धारण, भरणपोषण करनेवाला मेरा स्वरूप उन प्राणियोंमें स्थित नहीं है ॥
सार
Krishna says the whole universe is sustained by his unseen presence. Every being exists within him, yet he is not limited by any being.
The supreme reality holds everything without being held by anything.
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भगवद् गीता 9.5Speaker: Krishna
मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्
भूतभृन्न भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः
अर्थ · हिन्दी
यह सब संसार मेरे निराकार स्वरूपसे व्याप्त है । सम्पूर्ण प्राणी मुझ में स्थित हैं परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ तथा वे प्राणी भी मेरेमें स्थित नहीं हैं मेरे इस ईश्वरसम्बन्धी योगसामर्थ्य को देख सम्पूर्ण प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाला और उनका धारण, भरणपोषण करनेवाला मेरा स्वरूप उन प्राणियोंमें स्थित नहीं है ॥
सार
Krishna says that all beings are sustained by him, yet he is not contained within them. He asks Arjuna to see this divine power.
The supreme reality sustains all beings without being contained by them.
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भगवद् गीता 9.6Speaker: Krishna
यथाऽऽकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय
अर्थ · हिन्दी
जैसे सब जगह विचरनेवाली महान् वायु नित्य ही आकाशमें स्थित रहती है, ऐसे ही सम्पूर्ण प्राणी मुझमें ही स्थित रहते हैं ऐसा तुम मान लो ॥
सार
All living beings exist within Krishna just as wind moves within space. The verse asks Arjuna to hold this vision of divine presence everywhere.
What moves everywhere still rests in the divine.
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