भगवद् गीता में Nishkama Karma
भगवद् गीता के 12 श्लोक जो nishkama karma पर हैं — सभी अध्यायों से, क्रम में।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥
न चास्य सर्वभूतेषु कश्िचदर्थव्यपाश्रयः ॥
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥
- 3.20अ. 3
Perfection comes through action that serves more than the self.
राजा जनकजैसे अनेक महापुरुष भी कर्मके द्वारा ही परमसिद्धिको प्राप्त हुए हैं । इसलिये लोकसंग्रहको देखते हुए भी तू निष्काम
- 3.30अ. 3
Action becomes free when you stop claiming its results.
तू विवेकवती बुद्धिके द्वारा सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मोंको मेरे अर्पण करके कामना, ममता और संतापरहित होकर युद्धरूप कर्तव्यकर्मक
- 4.20अ. 4
Action loses its grip when nothing in you waits to possess its fruit.
जो कर्म और फलकी आसक्तिका त्याग करके आश्रयसे रहित और सदा तृप्त है, वह कर्मोंमें अच्छी तरह लगा हुआ भी वास्तवमें कुछ भी नही
- 4.23अ. 4
Action loses its grip when it becomes offering, not possession.
जिसकी आसक्ति सर्वथा मिट गयी है, जो मुक्त हो गया है, जिसकी बुद्धि स्वरूपके ज्ञानमें स्थित है, ऐसे केवल यज्ञके लिये कर्म क
- 5.10अ. 5
Action without attachment leaves no stain.
जो भक्तियोगी सम्पूर्ण कर्मोंको भगवान् में अर्पण करके और आसक्तिका त्याग करके कर्म करता है, वह जलसे कमलके पत्तेकी तरह पापस
- 6.1अ. 6
Renunciation means acting without needing to own the result.
श्रीभगवान् बोले कर्मफलका आश्रय न लेकर जो कर्तव्यकर्म करता है, वही संन्यासी तथा योगी है और केवल अग्निका त्याग करनेवाला स
- 8.7अ. 8
Action and remembrance can happen together without conflict.
इसलिये तू सब समयमें मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर । मेरेमें मन और बुद्धि अर्पित करनेवाला तू निःसन्देह मेरेको ही प्राप्त
- 18.6अ. 18
Right action is complete only when desire for reward is dropped.
हे पार्थ पूर्वोक्त यज्ञ, दान और तप इन कर्मोंको तथा दूसरे भी कर्मोंको आसक्ति और फलोंका त्याग करके करना चाहिये यह मेरा
- 18.23अ. 18
The purest action asks for nothing back.
जो कर्म शास्त्रविधिसे नियत किया हुआ और कर्तृत्वाभिमानसे रहित हो तथा फलेच्छारहित मनुष्यके द्वारा बिना रागद्वेषके किया हुआ