विषय · 11 श्लोक
भगवद् गीता में Manifestation
भगवद् गीता के 11 श्लोक जो manifestation पर हैं — सभी अध्यायों से, क्रम में।
- 7.6अपरा और परा इन दोनों प्रकृतियोंके संयोगसे ही सम्पूर्ण प्राणी उत्पन्न होते हैं, ऐसा तुम समझो । मैं सम्पूर्ण जगत् का प्रभव तथा प्रलय हूँ ॥
- 7.8हे कुन्तीनन्दन जलोंमें रस मैं हूँ, चन्द्रमा और सूर्यमें प्रभा प्रकाश मैं हूँ, सम्पूर्ण वेदोंमें प्रणव ओंकार मैं हूँ, आकाशमें शब्द और मनुष्य
- 9.7हे कुन्तीनन्दन कल्पोंका क्षय होनेपर सम्पूर्ण प्राणी मेरी प्रकृतिको प्राप्त होते हैं और कल्पोंके आदिमें मैं फिर उनकी रचना करता हूँ ॥
- 10.4बुद्धि, ज्ञान, असम्मोह, क्षमा, सत्य, दम, शम, सुख, दुःख, भव, अभाव, भय, अभय, अहिंसा, समता, तुष्टि, तप, दान, यश और अपयश प्राणियोंके ये अनेक प्
- 10.31पवित्र करनेवालोंमें वायु और शास्त्रधारियोंमें राम मैं हूँ । जलजन्तुओंमें मगर मैं हूँ । बहनेवाले स्त्रोतोंमें गङ्गाजी मैं हूँ ॥
- 10.35गायी जानेवाली श्रुतियोंमें बृहत्साम और वैदिक छन्दोंमें गायत्री छन्द मैं हूँ । बारह महीनोंमें मार्गशीर्ष और छः ऋतुओंमें वसन्त मैं हूँ ॥
- 10.41जोजो ऐश्वर्ययुक्त, शोभायुक्त और बलयुक्त प्राणी तथा वस्तु है, उसउसको तुम मेरे ही तेजयोग के अंशसे उत्पन्न हुई समझो ॥
- 10.42अथवा हे अर्जुन तुम्हें इस प्रकार बहुतसी बातें जाननेकी क्या आवश्यकता है मैं अपने किसी एक अंशसे सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त करके स्थित हूँ ॥
- 13.17वे परमात्मा स्वयं विभागरहित होते हुए भी सम्पूर्ण प्राणियोंमें विभक्तकी तरह स्थित हैं । वे जाननेयोग्य परमात्मा ही सम्पूर्ण प्राणियोंको उत्पन
- 13.27हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन स्थावर और जंगम जितने भी प्राणी पैदा होते हैं, उनको तुम क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके संयोगसे उत्पन्न हुए समझो ॥
- 15.12सूर्यमें आया हुआ जो तेज सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है और जो तेज चन्द्रमामें है तथा जो तेज अग्निमें है, उस तेजको मेरा ही जान ॥