भगवद् गीता में Ahankara
अहंकार वह 'मैं-निर्माता' है — जिससे असीम आत्मा एक सीमित, नामधारी व्यक्ति होने की भूल करती है। गीता अहंकार की निंदा नहीं करती — वह उसे मूल भ्रांति के रूप में पहचानती है और उससे परे इशारा करती है।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ॥
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ॥
इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ॥
- 16.15अ. 16
Pride turns abundance into delusion and makes more wanting feel justified.
हम धनवान् हैं, बहुतसे मनुष्य हमारे पास हैं, हमारे समान और कौन है हम खूब यज्ञ करेंगे, दान देंगे और मौज करेंगे इस तरह वे
- 16.18अ. 16
Ego makes you fight the divine presence you carry yourself.
वे अहङ्कार, हठ, घमण्ड, कामना और क्रोधका आश्रय लेनेवाले मनुष्य अपने और दूसरोंके शरीरमें रहनेवाले मुझ अन्तर्यामीके साथ द्व
- 17.5अ. 17
Harsh effort without right guidance can deepen ego instead of cleansing it.
जो मनुष्य शास्त्रविधिसे रहित घोर तप करते हैं जो दम्भ और अहङ्कारसे अच्छी तरह युक्त हैं जो भोगपदार्थ, आसक्ति और हठसे युक्त
- 17.6अ. 17
Harshness is not holiness when it destroys the body and ignores what lives within.
जो मनुष्य शास्त्रविधिसे रहित घोर तप करते हैं जो दम्भ और अहङ्कारसे अच्छी तरह युक्त हैं जो भोगपदार्थ, आसक्ति और हठसे युक्त
- 18.25अ. 18
Blind action begins where clear seeing is absent.
जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और सामर्थ्यको न देखकर मोहपूर्वक आरम्भ किया जाता है, वह तामस कहा जाता है ॥
- 18.58अ. 18
Grace opens the way; ego closes it.
मेरेमें चित्तवाला होकर तू मेरी कृपासे सम्पूर्ण विघ्नोंको तर जायगा और यदि तू अहंकारके कारण मेरी बात नहीं सुनेगा तो तेरा प
- 18.59अ. 18
Ego cannot veto what your nature has already chosen.
अहंकारका आश्रय लेकर तू जो ऐसा मान रहा है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा, तेरा यह निश्चय मिथ्या झूठा है क्योंकि तेरी क्षात्रप्र