विषय · 14 श्लोक
भगवद् गीता में Tyaga
भगवद् गीता के 14 श्लोक जो tyaga पर हैं — सभी अध्यायों से, क्रम में।
- 3.30तू विवेकवती बुद्धिके द्वारा सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मोंको मेरे अर्पण करके कामना, ममता और संतापरहित होकर युद्धरूप कर्तव्यकर्मको कर ॥
- 12.12अभ्याससे शास्त्रज्ञान श्रेष्ठ है, शास्त्रज्ञानसे ध्यान श्रेष्ठ है और ध्यानसे भी सब कर्मोंके फलका त्याग श्रेष्ठ है । कर्मफलत्यागसे तत्काल ही
- 17.20दान देना कर्तव्य है ऐसे भावसे जो दान देश, काल और पात्रके प्राप्त होनेपर अनुपकारीको दिया जाता है, वह दान सात्त्विक कहा गया है ॥
- 18.1अर्जुन बोले हे महाबाहो हे हृषीकेश हे केशिनिषूदन मैं संन्यास और त्यागका तत्त्व अलगअलग जानना चाहता हूँ ॥
- 18.2॥
- 18.3श्रीभगवान् बोले कई विद्वान् काम्यकर्मोंके त्यागको संन्यास कहते हैं और कई विद्वान् सम्पूर्ण कर्मोंके फलके त्यागको त्याग कहते हैं । कई विद्व
- 18.4हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन तू संन्यास और त्याग इन दोनोंमेंसे पहले त्यागके विषयमें मेरा निश्चय सुन क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ त्याग तीन
- 18.6हे पार्थ पूर्वोक्त यज्ञ, दान और तप इन कर्मोंको तथा दूसरे भी कर्मोंको आसक्ति और फलोंका त्याग करके करना चाहिये यह मेरा निश्चित किया हुआ उत
- 18.7नियत कर्मका तो त्याग करना उचित नहीं है । उसका मोहपूर्वक त्याग करना तामस कहा गया है ॥
- 18.8जो कुछ कर्म है, वह दुःखरूप ही है ऐसा समझकर कोई शारीरिक क्लेशके भयसे उसका त्याग कर दे, तो वह राजस त्याग करके भी त्यागके फलको नहीं पाता ॥
- 18.9हे अर्जुन केवल कर्तव्यमात्र करना है ऐसा समझकर जो नियत कर्म आसक्ति और फलका त्याग करके किया जाता है, वही सात्त्विक त्याग माना गया है ॥
- 18.10जो अकुशल कर्मसे द्वेष नहीं करता और कुशल कर्ममें आसक्त नहीं होता, वह त्यागी, बुद्धिमान्, सन्देहरहित और अपने स्वरूपमें स्थित है ॥
- 18.11कारण कि देहधारी मनुष्यके द्वारा सम्पूर्ण कर्मोंका त्याग करना सम्भव नहीं है । इसलिये जो कर्मफलका त्यागी है, वही त्यागी है ऐसा कहा जाता है ॥
- 18.12कर्मफलका त्याग न करनेवाले मनुष्योंको कर्मोंका इष्ट, अनिष्ट और मिश्रित ऐसे तीन प्रकारका फल मरनेके बाद भी होता है परन्तु कर्मफलका त्याग करनेव