भगवद् गीता में Karma Phala
भगवद् गीता के 10 श्लोक जो karma phala पर हैं — सभी अध्यायों से, क्रम में।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः ॥
- 4.23अ. 4
Action loses its grip when it becomes offering, not possession.
जिसकी आसक्ति सर्वथा मिट गयी है, जो मुक्त हो गया है, जिसकी बुद्धि स्वरूपके ज्ञानमें स्थित है, ऐसे केवल यज्ञके लिये कर्म क
- 5.14अ. 5
What looks like personal control is nature moving through form.
परमेश्वर मनुष्योंके न कर्तापनकी, न कर्मोंकी और न कर्मफलके साथ संयोगकी रचना करते हैं किन्तु स्वभाव ही बरत रहा है ॥
- 5.15अ. 5
Ignorance, not action, is what keeps beings confused.
सर्वव्यापी परमात्मा न किसीके पापकर्मको और न शुभकर्मको ही ग्रहण करता है किन्तु अज्ञानसे ज्ञान ढका हुआ है, उसीसे सब जीव मो
- 6.1अ. 6
Renunciation means acting without needing to own the result.
श्रीभगवान् बोले कर्मफलका आश्रय न लेकर जो कर्तव्यकर्म करता है, वही संन्यासी तथा योगी है और केवल अग्निका त्याग करनेवाला स
- 14.15अ. 14
Your strongest tendency decides the shape of your next beginning.
रजोगुणके बढ़नेपर मरनेवाला प्राणी मनुष्ययोनिमें जन्म लेता है तथा तमोगुणके बढ़नेपर मरनेवाला मूढ़योनियोंमें जन्म लेता है ॥
- 14.16अ. 14
Action carries its own flavor of result.
विवेकी पुरुषोंने शुभकर्मका तो सात्त्विक निर्मल फल कहा है, राजस कर्मका फल दुःख कहा है और तामस कर्मका फल अज्ञान मूढ़ता कहा
- 18.12अ. 18
The chain of action ends when desire for its fruit ends.
कर्मफलका त्याग न करनेवाले मनुष्योंको कर्मोंका इष्ट, अनिष्ट और मिश्रित ऐसे तीन प्रकारका फल मरनेके बाद भी होता है परन्तु