विषय · 14 श्लोक

भगवद् गीता में Indriya Nigraha

भगवद् गीता के 14 श्लोक जो indriya nigraha पर हैं — सभी अध्यायों से, क्रम में।

चुने हुए 3 श्लोक — पूरा पाठ + संस्कृत ऑडियो
भगवद् गीता 2.58Speaker: Krishna
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता
अर्थ · हिन्दी
जिस तरह कछुआ अपने अङ्गोंको सब ओरसे समेट लेता है, ऐसे ही जिस कालमें यह कर्मयोगी इन्द्रियोंके विषयोंसे इन्द्रियोंको सब प्रकारसे समेट लेता हटा लेता है, तब उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित हो जाती है ॥
सार
Wisdom becomes stable when the senses are pulled back from the things they chase, just as a tortoise draws in its limbs.
Steadiness begins when the senses stop running outward.
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भगवद् गीता 2.64Speaker: Krishna
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति
अर्थ · हिन्दी
वशीभूत अन्तःकरणवाला कर्मयोगी साधक रागद्वेषसे रहित अपने वशमें की हुई इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका सेवन करता हुआ अन्तःकरणकी निर्मलता को प्राप्त हो जाता है । निर्मलता प्राप्त होनेपर साधकके सम्पूर्ण दुःखोंका नाश हो जाता है और ऐसे शुद्ध चित्तवाले साधककी बुद्धि निःसन्देह बहुत जल्दी परमात्मामें स्थिर हो जाती है ॥
सार
A person with controlled senses can engage with the world without craving or rejecting it, and that steadiness brings inner clarity.
Freedom comes from meeting experience without attraction or aversion.
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भगवद् गीता 2.66Speaker: Krishna
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य चायुक्तस्य भावना
चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्
अर्थ · हिन्दी
जिसके मनइन्द्रियाँ संयमित नहीं हैं, ऐसे मनुष्यकी व्यवसायात्मिका बुद्धि नहीं होती और व्यवसायात्मिका बुद्धि न होनेसे उसमें कर्तव्यपरायणताकी भावना नहीं होती । ऐसी भावना न होनेसे उसको शान्ति नहीं मिलती । फिर शान्तिरहित मनुष्यको सुख कैसे मिल सकता है ॥
सार
A person who cannot control the mind and senses lacks clear judgment, steady purpose, peace, and therefore real happiness.
Without inner discipline, even happiness has no place to stand.
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