भगवद् गीता में Atman
आत्मा वह है जो आप वास्तव में हैं — किसी नाम, शरीर या भूमिका से पहले। जो बदलते को देखती है, स्वयं अपरिवर्तित रहकर। गीता का पहला क़दम और अंतिम क़दम — दोनों इसी की ओर।
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ॥
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित् कर्तुमर्हति ॥
- 2.20अ. 2
What you are cannot be touched by birth or death.
यह शरीरी न कभी जन्मता है और न मरता है तथा यह उत्पन्न होकर फिर होनेवाला नहीं है । यह जन्मरहित, नित्यनिरन्तर रहनेवाला, शा
- 2.21अ. 2
Clear seeing makes violence look absurd.
हे पृथानन्दन जो मनुष्य इस शरीरीको अविनाशी, नित्य, जन्मरहित और अव्यय जानता है, वह कैसे किसको मारे और कैसे किसको मरवाये ॥
- 2.23अ. 2
Your deepest reality is beyond every physical force.
शस्त्र इस शरीरीको काट नहीं सकते, अग्नि इसको जला नहीं सकती, जल इसको गीला नहीं कर सकता और वायु इसको सुखा नहीं सकती ॥
- 2.24अ. 2
What you are cannot be harmed by anything that changes.
यह शरीरी काटा नहीं जा सकता, यह जलाया नहीं जा सकता, यह गीला नहीं किया जा सकता और यह सुखाया भी नहीं जा सकता । कारण कि यह
- 2.25अ. 2
What is deepest in you was never available for loss.
यह देही प्रत्यक्ष नहीं दीखता, यह चिन्तनका विषय नहीं है और यह निर्विकार कहा जाता है । अतः इस देहीको ऐसा जानकर शोक नहीं क
- 2.29अ. 2
The true self remains mysterious even after endless hearing.
कोई इस शरीरीको आश्चर्यकी तरह देखता है और वैसे ही अन्य कोई इसका आश्चर्यकी तरह वर्णन करता है तथा अन्य कोई इसको आश्चर्यकी त
- 2.30अ. 2
What is most real in a person cannot be killed, so grief loses its ground.
हे भरतवंशोद्भव अर्जुन सबके देहमें यह देही नित्य ही अवध्य है । इसलिये सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये अर्थात् किसी भी प्राणीके
- 6.18अ. 6
Yoga begins when craving loses its grip and the mind comes home.
वशमें किया हुआ चित्त जिस कालमें अपने स्वरूपमें ही स्थित हो जाता है और स्वयं सम्पूर्ण पदार्थोंसे निःस्पृह हो जाता है, उस
- 13.25अ. 13
The same realization opens through different disciplines.
कई मनुष्य ध्यानयोगके द्वारा, कई सांख्ययोगके द्वारा और कई कर्मयोगके द्वारा अपनेआपसे अपनेआपमें परमात्मतत्त्वका अनुभव करते