विषय · 11 श्लोक

भगवद् गीता में Karma

जो आप करते हैं, वही आप बनते हैं। कर्म गीता का केंद्रीय प्रश्न है — क्या कर्म बंधन है या मुक्ति? ये वे श्लोक हैं जहाँ कृष्ण इसका उत्तर देते हैं।

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भगवद् गीता 3.14Speaker: Krishna
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः
अर्थ · हिन्दी
सम्पूर्ण प्राणी अन्नसे उत्पन्न होते हैं । अन्न वर्षासे होती है । वर्षा यज्ञसे होती है । यज्ञ कर्मोंसे निष्पन्न होता है । कर्मोंको तू वेदसे उत्पन्न जान और वेदको अक्षरब्रह्मसे प्रकट हुआ जान । इसलिये वह सर्वव्यापी परमात्मा यज्ञ कर्तव्यकर्म में नित्य प्रतिष्ठित है ॥
सार
Life depends on a chain: food comes from rain, rain comes from sacrifice, and sacrifice comes from action.
Action sustains the cycle that makes life possible.
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भगवद् गीता 4.13Speaker: Krishna
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्
अर्थ · हिन्दी
मेरे द्वारा गुणों और कर्मोंके विभागपूर्वक चारों वर्णोंकी रचना की गयी है । उससृष्टिरचना आदि का कर्ता होनेपर भी मुझ अव्यय रमेश्वरको तू अकर्ता जान । कारण कि कर्मोंके फलमें मेरी स्पृहा नहीं है, इसलिये मुझे कर्म लिप्त नहीं करते । इस प्रकार जो मुझे तत्त्वसे जान लेता है, वह भी कर्मोंसे नहीं बँधता ॥
सार
The four social orders arise from qualities and actions, but Krishna says he remains the unchanging one who is not bound by creation.
The source of order stands outside the order it creates.
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भगवद् गीता 4.33Speaker: Krishna
श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते
अर्थ · हिन्दी
हे परन्तप अर्जुन द्रव्यमय यज्ञसे ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है । सम्पूर्ण कर्म और पदार्थ ज्ञानतत्त्वज्ञान में समाप्त हो जाते हैं ॥
सार
Inner understanding is higher than outer offerings. Every action and every material effort finally leads toward knowledge.
Knowledge is the point where every action finally comes to rest.
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